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ज़िन्दगी पर शायरी

ज़िन्दगी पर शायरी
ज़िन्दगी पर शायरी

जो गुज़ारी ना जा सकी हमसे
हमने वो ज़िंदगी गुज़ारी है
जून ईलिया

ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पांव फीलाओं तो दीवार में सर लगता है
बशीर बदर

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इशक़ कीजिए फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
निदा फ़ाज़ली

ज़िंदगी ज़िंदा-दिल्ली का है नाम
मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं
इमाम बख़श नासिख़

ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मुहब्बत में
जून ईलिया

ज़िन्दगी पर शायरी


सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
ख़्वाजा मीर दर्द

उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में
सीमाब अकबराबादी

मौत का भी ईलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई ईलाज नहीं
फ़िराक़-गोरखपुरी

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी किया है किताबों को हटा कर देखो
निदा फ़ाज़ली

ज़िंदगी शायद उसी का नाम है
दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ
कैफ़ भोपाली

ज़िन्दगी पर शायरी


तुम मुहब्बत को खेल कहते हो
हमने बर्बाद ज़िंदगी कर ली
बशीर बदर

देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से
साहिर लुधियानवी

ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिसमें
हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अब तो ख़ुशी का ग़म है ना ग़म की ख़ुशी मुझे
बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे
शकील बद एवनी

ज़िन्दगी पर शायरी


यूं तो मरने के लिए ज़हर सभी पीते हैं
ज़िंदगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैंने
ख़लील अल रहमान आज़मी

ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को
अपने अंदाज़ से गँवाने का
जून ईलिया

इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ
जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से
साहिर लुधियानवी

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ए दोस्त
वो तेरी याद में हों, या तुझे भुलाने में
फ़िराक़-गोरखपुरी

अब मेरी कोई ज़िंदगी ही नहीं
अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो किया
जून ईलिया

ज़िन्दगी पर शायरी


ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब
मौत किया है उन्हीं अजज़ा का परीशाँ होना
चकबस्त बुरज निरावन

ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है
क्यों देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम
साहिर लुधियानवी

तो कहानी ही के पर्दे में भली लगती है
ज़िंदगी तेरी हक़ीक़त नहीं देखी जाती
अख़तर सईद ख़ान

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया
साहिर लुधियानवी

दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए
ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है
कलीम आजिज़

कोई ख़ामोश ज़ख़म लगती है
ज़िंदगी एक नज़म लगती है
गुलज़ार

ज़िन्दगी पर शायरी


कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं
ज़िंदगी तू ने तो धोके पे दिया है धोका
फ़िराक़-गोरखपुरी

हर-नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत फ़ानी
ज़िंदगी नाम है मर-मर के जिए जाने का
फ़ानी बद एवनी

यही है ज़िंदगी कुछ ख़ाब चंद उम्मीदें
उन्हें खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
निदा फ़ाज़ली

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा
अहमद फ़राज़

इक मुअम्मा है समझने का ना समझाने का
ज़िंदगी काहे को है, ख़ाब है दीवाने का
फ़ानी बद एवनी

ज़िन्दगी पर शायरी


ज़िंदगी है या कोई तूफ़ान है
हम तो इस जीने के हाथों मर चले
ख़्वाजा मीर दर्द

गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैंने
वो कौन है जिसे देखा नहीं कभी मैंने
जून ईलिया

जो लोग मौत को ज़ालिम क़रार देते हैं
ख़ुदा मिलाए उन्हें ज़िंदगी के मारों से
नज़ीर सिद्दीक़ी

मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले
हंसी आ रही है तरी सादगी पर
गोपाल मित्तल

ज़िंदगी किया है आज उसे ए दोस्त
सोच लें और उदास हो जाएं
फ़िराक़-गोरखपुरी

ज़िन्दगी पर शायरी


ज़िंदगी किया है इक कहानी है
ये कहानी नहीं सुनानी है
जून ईलिया

हम ग़मज़दा हैं ,लाएँ कहाँ से ख़ुशी के गीत
देंगे वही जो पाएँगे इस ज़िंदगी से हम
साहिर लुधियानवी

ये माना ज़िंदगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी
फ़िराक़-गोरखपुरी

मीर उम्दन भी कोई मरता है
जान है तो जहान है प्यारे
मीर तक़ी मीर

है अजीब शहर की ज़िंदगी ना सफ़र रहा ना क़ियाम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बदमिज़ाज सी शाम है
बशीर बदर

ज़िन्दगी पर शायरी


गर ज़िंदगी में मिल गए फिर इत्तिफ़ाक़ से
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम
साहिर लुधियानवी

मेरी ज़िंदगी तो गुज़री तिरे हिजर के सहारे
मेरी मौत को भी प्यारे कोई चाहीए बहाना
जिगर आबाद य

यूं ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तेरेबग़ैर
जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ में
जिगर मुरादाबादी

ज़िंदगी कम पढ़े परदेसी का ख़त है इबरत
ये किसी तरह पढ़ा जाये ना समझा जाये
इबरत मछलीशहरी

क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म असल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यों
मिर्ज़ा ग़ालिब

ज़िन्दगी पर शायरी


ज़िंदगी जब अज़ाब होती है
आशिक़ी कामयाब होती है
दुष्यंत कुमार

बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक-बार तेरी आरज़ू भी खो देते
मजरूह सुलतानपुरी

किस तरह जमा कीजिए अब अपने आपको
काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
आदिल मंसूरी

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं
यूं देखती है जैसे मुझे जानती नहीं
अंजुम रहबर

मुसीबत और लंबी ज़िंदगानी
बुज़ुर्गों की दुआ ने मार डाला
मुज़्तर ख़ैराबादी

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