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केवल विपक्षी पार्टियों से ही नहीं भाजपा के अंदर भी मुकाबला कर रहे हैं योगी

योगी आदित्यनाथ /yogi adityanath
योगी आदित्यनाथ /yogi adityanath

दीवारों के कान

कहते हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं। इसलिए जो बातें किसी मुंह से निकल गई उसे छुपना मुश्किल होता है। किसी न किसी के जरिए उन लोगों तक पहुंच ही जाती है जिनसे आप छुपना चाहते हैं। अभी पांच राज्यों में विधानसभा का चुनाव होना है। थिंकर बाबू चुनाव औऱ राजनीति की उन खबरों की चर्चा आपसे करेगा जिसे टॉप सीक्रेट रखा जा रहा है। यानी राजनेताओं से जुड़े कुछ लोगों की जुबान जब कभी कभार फिसल जाती है तो कई राज की बातें सामने आ जाती है। इस अंक में हम कुछ ऐसी राजनीतिक खबरों की चर्चा करेंगे।

आज हम चर्चा करते हैं एक ऐसे ही खबरों की जिसकी चर्चा भाजपा सियासी गलियारों में चहलकदमी करने वाले लोग दबी जुबान से कर रहे हैं। बात यह है कि इस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का मुकाबला केवल विपक्षी पार्टियों से ही नहीं है बल्कि अपनी पार्टी के अंदर यानी भाजपा के अंदर भी उन्हें कठिन मुकाबला का सामना करना पड़ रहा है।

बाहरी तौर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विपक्षी पार्टियों का मुकाबला कर रहे हैं। मुख्य रूप से उनका मुकाबला समाजवादी पार्टी से है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में मायावादी और कांग्रेस की स्थिति पिछले बार से कमजोर दिख रही है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि भीम सेना के बढ़ते प्रभाव से मायावती का दलित जनाधार कुछ हद तक खिसक चुका है। साथ ही इस बार भी वो ब्राह्मण और ओबीसी वोटों की सेंधमारी में सफल होती नहीं दिख रही है। रही बात कांग्रेस की तो राहुल गांधी के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद इस बार उत्तर प्रदेश चुनाव का कमान सीधे प्रियंका गांधी के हाथ में आ गयी है। ‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ के स्लोगन के साथ उन्होंने अपनी चुनावी लड़ाई शुरू कर दी है। लेकिन कांग्रेस इतना पीछे जा चुकी है कि वह उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए कोई मुश्किल भी पैदा नहीं कर सकती। लेकिन यह सच है कि समाजवादी पार्टी से भाजपा को कड़ा टक्कर मिल रहा है। चुनाव की तारीखों की घोषणा होते ही भाजपा के 13 विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं जिसमें स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे दिग्गज मंत्री भी है। इनका ओबीसी में जनाधार भी है। भाजपा के पलायन कर चुके विधायकों में से ज्यादातर सपा में शामिल भी हो चुके हैं। इसलिए सपा की ओर से भाजपा को कड़ा मुकाबला मिल भी रहा है।

योगी आदित्यनाथ की परेशानी

लेकिन योगी आदित्यनाथ की परेशानी यही तक सीमित नहीं है। राजनीति के जानकारों की माने तो भाजपा के अंदर भी उनके खिलाफ गहरी गुटबाजी हो रही है। लोगों की माने तो उनकी लोकप्रियता को किसी की नज़र लग गयी है। दरअसल, उनके हिंदुत्ववादी व्यक्तित्व इतना प्रभावी बन चुका है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद सबसे लोकप्रिय नेता में योगी आदित्यनाथ का ही नाम शामिल हो चुका है। पूरे कार्यकाल में उनकी ऐसी छवि उभरी कि उनकी लोकप्रियता नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से प्रतिस्पर्धा करने लगी। हिंदुत्ववादी समर्थकों की नज़र में तो योगी जी मोदी जी से ज्यादा कट्टरवादी चेहरा बन चुके हैं।

इसका मतलब भी साफ है। योगी आदित्यनाथ नरेंद्र मोदी के हिंदुत्ववादी इमेज में सेंधमारी कर रहे हैं। जिसके कारण आरएसएस पर मोदी का प्रभाव कम रहा है। और इसका सबसे ज्यादा प्रभाव गृह मंत्री अमित शाह के इमेज पर पड़ रहा है। साल 2014 से लेकर साल 2017 तक यानी योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले तक भाजपा के लोकप्रिय नेता के रूप में नरेंद्र मोदी के बाद अमित शाह का ही नाम आता था। लेकिन योगी जी हिंदुत्ववादी राजनीति को इतना बड़ा आकार दे दिया कि अमित शाह उनसे पीछे छूट गए। अगर इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ चुनाव जीत जाती है और योगी आदित्यनाथ दुबारा मुख्यमंत्री बन जाते हैं तो फिर योगी जी की लोकप्रियता को छू पाना अमित शाह के लिए कठिन हो जाएगा और मोदी की लोकप्रियता भी योगी जी की लोकप्रियता के मुकाबले घट सकती है। इसलिए इस चुनाव में योगी आदित्यनाथ के लिए पार्टी के अंदर की राह को भी पथरीला बनाया जा रहा है ताकि या तो भाजपा जीते ही नहीं या चुनाव जीत जाए तो योगी आदित्यनाथ दुबारा मुख्यमंत्री न बन सके।

नरेंद्र मोदी को अपनी छवि की चिंता

राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी छवि की चिंता सताने लगी है। साल 2018 में तीन राज्यों छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए था। इन राज्यों में भाजपा की हार के पीछे मोदी गुट के इरादों पर संदेह किया जा रहा है। दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा में आडवाणी की जगह प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में नरेंद्र मोदी के नाम की चर्चा की जा रही थी तब नरेंद्र मोदी के पक्ष में यह तर्क दिया गया था कि मोदी ही अब तक एक मात्र ऐसे नेता है जो लगातार 4 बार पूर्ण बहुमत से चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री बने है। अगर 2018 के विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा चुनाव जीत जाती तो रमन सिंह तथा शिवराज सिंह भी लगातार 4 बार मुख्यमंत्री बनने वाले भाजपा नेता की सूची में शामिल हो जाते। और इसके ठीक एक साल बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भी सवाल खड़ा हो सकता था। क्योंकि नोटबन्दी जैसे निर्णय से इनकी लोकप्रियता में गिरावट हुई थी। इसीलिए यह कयास लगाए गए हैं कि भाजपा का मोदी गुट यह नहीं चाहता था कि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बने।

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