याद पर शायरी

याद पर शायरी

याद वाबस्ता है जिसे भूल गया ख़लवत में
तुम तो हर वक़त मेरे साथ रहा करते हो
इबरार मुजीब

याद का दिल के दरीचे से गुज़र कैसे हो
तेरी तज्सीम मुकम्मल है मेरी आँखों में
सदफ़ इक़बाल

दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल-ओ-याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं
आग इस घर में लगी ऐसी कि जो था जल गया
ग़ालिब

मुद्दत रहेगी याद तेरे चेहरे की झलक
जल्वे को जिसने माह के जी से भुला दिया
मीर

करोगे याद बातें तो कहोगे
कि कोई रफत-ए-बिसयारगो था
मीर

दिल ताब ही लाया ना टुकता याद रहता हमनशीं
अब ऐश रोज़-ए-वस्ल का है जी में भूला ख़ाब सा
मीर

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
ना जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाये
बशीर बदर

याद पर शायरी

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बे-हिसाब आए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

उसकी याद आई है सांसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है
राहत इंदौरी

अच्छा-ख़ासा बैठे-बैठे गुम हो जाता हूँ
अब मैं अक्सर में नहीं रहता तुम हो जाता हूँ
अनवर शऊर

एक मुद्दत से तेरी याद भी आई ना हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं
फ़िराक़-गोरखपुरी

चुपके चुपके रात-दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
हसरत मोहानी

तुम्हारी याद के जब ज़ख़म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आपके बाद हर घड़ी हमने
आपके साथ ही गुज़ारी है
गुलज़ार

याद पर शायरी

नहीं आती तो याद उनकी महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं
हसरत मोहानी

दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया
नासिर काज़मी

आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर
जिसके होते हुए होते थे ज़माने मेरे
अहमद फ़राज़

तुमने किया ना याद कभी भूल कर हमें
हमने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया
बहादुर शाह ज़फ़र

क्या सितम है कि अब तेरी सूरत
ग़ौर करने पे याद आती है
जून ईलिया


वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
दाग़ देहलवी

तसद्दुक़ इस करम के मैं कभी तन्हा नहीं रहता
के जिस दिन तुम नहीं आते तुम्हारी याद आती है
जलील मानक पूरी

याद पर शायरी

हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उनको
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया
साहिर लुधियानवी

सोचता हूँ कि इस की याद आख़िर
अब किसे रात-भर जगाती है
जून ईलिया

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना ना याद आ कि तुझे भूल जाएं हम
अहमद फ़राज़

वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं
ख़ुमार बारहबंकवी

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ए दोस्त
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में
फ़िराक़-गोरखपुरी

याद उसे इंतिहाई करते हैं
सो हम उस की बुराई करते हैं
जून ईलिया

ये इलम का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
जांनिसार अख़तर

याद पर शायरी


”आपकी याद आती रही रात-भर
चांदनी दिल दुखाती रही रात-भर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

याद-ए-माज़ी अज़ाब है यारब
छीन ले मुझसे हाफ़िज़ा मेरा
अख़तर अंसारी

अब तो हर बात याद रहती है
ग़ालिबन मैं किसी को भूल गया
जून ईलिया

इक अजब हाल है कि अब इस को
याद करना भी बेवफ़ाई है
जून ईलिया

याद रखना ही मुहब्बत में नहीं है सब कुछ
भूल जाना भी बड़ी बात हुआ करती है
जमाल अहसानेवह

कोई दोस्त था अच्छे दिनों का
जो पिछली रात से याद आ रहा है
नासिर काज़मी

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास
दिल को कई कहानियां याद सी आके रह गईं
फ़िराक़-गोरखपुरी

याद पर शायरी

याद उसकी इतनी ख़ूब नहीं मीर बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया ना जाएगा
मीर तक़ी मीर

वो नहीं भूलता जहां जाऊं
हाय में क्या करूँ कहाँ जाऊं
इमाम बख़श नासिख़

उनका ज़िक्र उनकी तमन्ना उनकी याद
वक़्त कितना क़ीमती है आजकल
शकील बदायूंनी

याद आई है तो फिर टूट के याद आई है
कोई गुज़री हुई मंज़िल कोई भूली हुई दोस्त
अहमद फ़राज़

कुछ बिखरी हुई यादों के क़िस्से भी बहुत थे
कुछ उसने भी बालों को खुला छोड़ दिया था
मुनव्वर राना

जाते हो ख़ुदा-हाफ़िज़ हाँ इतनी गुज़ारिश है
जब याद हम आ जाएं मिलने की दुआ करना
जलील मानक पूरी

ज़रा सी बात सही तेरा याद आ जाना
ज़रा सी बात बहुत देर तक रुलाती थी
नासिर काज़मी

किसी सबब से अगर बोलता नहीं हूँ मैं
तो यूं नहीं कि तुझे सोचता नहीं हूँ मैं
इफ़्तिख़ार मुग़ल

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