हम ने काँटों को भी नरमी से छुआ है अक्सर लोग बेदर्द हैं फूलों को मसल देते हैं बिस्मिल सईदी

लोग काँटों से बच के चलते हैं मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं अज्ञात

मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूँ वो ख़ुद गुलाब था उस को गुलाब क्या देता अफ़ज़ल इलाहाबादी

काँटों से दिल लगाओ जो ता-उम्र साथ दें फूलों का क्या जो साँस की गर्मी न सह सकें अख़्तर शीरानी

काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ शकील बदायुनी

शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ आँखें मिरी भीगी हुई चेहरा तिरा उतरा हुआ बशीर बद्र

आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे तितलियाँ मंडला रही हैं काँच के गुल-दान पर शकेब जलाली

अगरचे फूल ये अपने लिए ख़रीदे हैं कोई जो पूछे तो कह दूँगा उस ने भेजे हैं इफ़्तिख़ार नसीम

फूल ही फूल याद आते हैं आप जब जब भी मुस्कुराते हैं साजिद प्रेमी

फूल कर ले निबाह काँटों से आदमी ही न आदमी से मिले ख़ुमार बाराबंकवी

फूल खिले हैं लिखा हुआ है तोड़ो मत और मचल कर जी कहता है छोड़ो मत अमीक़ हनफ़ी

ख़ुदा के वास्ते गुल को न मेरे हाथ से लो मुझे बू आती है इस में किसी बदन की सी नज़ीर अकबराबादी

सच है एहसान का भी बोझ बहुत होता है चार फूलों से दबी जाती है तुर्बत मेरी जलील मानिकपूरी

सुनो कि अब हम गुलाब देंगे गुलाब लेंगे मोहब्बतों में कोई ख़सारा नहीं चलेगा जावेद अनवर

काँटे तो ख़ैर काँटे हैं इस का गिला ही क्या फूलों की वारदात से घबरा के पी गया साग़र सिद्दीक़ी

हमेशा हाथों में होते हैं फूल उन के लिए किसी को भेज के मंगवाने थोड़ी होते हैं अनवर शऊर