उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए बशीर बद्र

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ अहमद फ़राज़

उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है राहत इंदौरी

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया वर्ना हम भी आदमी थे काम के मिर्ज़ा ग़ालिब

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले मिर्ज़ा ग़ालिब

और क्या देखने को बाक़ी है आप से दिल लगा के देख लिया फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है निदा फ़ाज़ली

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए उबैदुल्लाह अलीम

न जी भर के देखा न कुछ बात की बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की बशीर बद्र

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता बशीर बद्र

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है हसरत मोहानी

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता अकबर इलाहाबादी

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ अहमद फ़राज़

ज़िंदगी किस तरह बसर होगी दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में जौन एलिया