वक़्त पर शायरी

वक़्त पर शायरी

वक़्त अच्छा भी आएगा ‘नासिर’
ग़म ना कर ज़िंदगी पड़ी है अभी
नासिर काज़मी
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टूटी कमंद बख़्त का वो ज़ोर रह गया
जब बाम दोस्त हाथ से कुछ दूर रह गया
नामालूम

हादिसा भी होने में वक़्त कुछ तो लेता है
बख़्त के बिगड़ने में देर कुछ तो लगती है
अमजद इस्लाम अमजद

ऐ चश्म जो ये अशक तू भर लाई है कमबख़्त
इस में तो सरासर मेरी रुस्वाई है कमबख़्त
नज़ीर अकबराबादी

तोड़े हैं बहुत शीशा-ए-दिल जिसने ‘नज़ीर आह
फिर चर्ख़ वही गुंबद बीनाई है कमबख़्त
नज़ीर अकबराबादी
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वक़्त पर शायरी


गले मिला ना कभी चांद बख़्त ऐसा था
हरा-भरा बदन अपना दरख़्त ऐसा था
शकेब जलाली

लज़्ज़त-ए-ग़म तो बख़श दी उसने
हौसले भी ‘अदम दिए होते
अब्दुल हमीद अदम
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क्या हमारी नमाज़ क्या रोज़ा
बख़श देने के सौ बहाने हैं
मीर मह्दी मजरूह
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फूंक कर मैंने आशियाने को
रोशनी बख़श दी ज़माना को
आरिफ़ अब्बासी बलियावी

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