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विनय कुमार की शायरी

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ghazal/shairi
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मछली सी आँखें लिए

कवि: विनय कुमार

मछलियों के बग़ैर कितना दुस्तर होता यह जीवन समुद्र
शुक्र है कि जीवन के बाहर समुद्र है और समुद्र में मछलियाँ
जिन्हें पानी की डालों से तोड़ती हूँ रोज़ और
सूखी टोकरी में सजाती हूँ सोज़ की सेज पर
बेचती हूँ छटपट-छटपट नाचती और जाती हुई जान


कितना अजीब है यह बात कि जाल में फँसे हाथ
बुनते-फैलाते हैं जाल, एक भी धागा तोड़ नहीं पाते


हाय! कितनी आभागिन हूँ मैं कि जीवन समुद्र
सुंदर और चंचल की मौत से अटा है
कहीं के पानी से नहाऊँ मछली और मृत्यु की महक से
मुक्ति नहीं, युक्ति नहीं कोई
कि धर दूँ सब किया-धरा वापस


हिरणों सी आँखें लिए जनमी थी
मछली-सी आँखें लिए मरूँगी !


ग़ज़ल

कभी सोचा नहीं था वक़्त यूँ मुश्ताक़ सा होगा
कि मेरे अजनबी क़दमों का रस्ता देखता होगा


कहाँ यह कोह पैमाई कहाँ लाचारियाँ अपनी
क़शिश वो संग ओ सब्ज़ा में कि मेरा सिर फिरा होगा


वो रानाई मेरी आँखों की बीनाई हुई होगी
मुझे मंज़र दिखा होगा ….पस ए मंज़र दिखा होगा


बहुत आसान है कहना किसी जादू का जादू था
बहुत मुश्किल समझ पाना कि सचमुच क्या हुआ होगा


ग़ज़लगोई की आँखों में चमक यूँ ही नहीं आई
कोई लम्हा लहू के बीच में मोती हुआ होगा


उदासी जब कभी घिरती है मेरे आसमानों में
समझ जाता हूँ कोई ज़ख़्म अब मुझसे जुदा होगा


तुझे मैं दीन ओ दिल की क़ैद से आज़ाद करता हूँ
अगर तू सिर्फ़ मेरा है तो फिर कैसे ख़ुदा होगा

मुश्ताक़ : उत्सुक ,कोह पैमाई- पहाड़ की पैमाईश
रानाई -सुंदरता , बीनाई – दृष्टि
मंज़र – दृश्य , पस ए मंज़र -दृश्य के पीछे

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