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कविता : खड़िया छूना

विनय कुमार
विनय कुमार

(मेरे गाँव में विद्यारंभ को खड़िया छूना कहते थे )

कवि: विनय कुमार

याद आता है वो पाकड का फैला-फैला दरख़्त
याद आते हैं वो अतफ़ाल जो मेरी सिन के
याद आता है वो गर्द ओ ग़ुबार का चंदन
याद आते हैं कई खेल जो भुलाए गए

याद आती है वो बाद ए सबा सी उड़ती सुबह
जब मुझे खेल से खींचा गया था हौले से
थाम के नर्म कलाई को सख़्त नर्मी से
दादी अम्मा ने कहा था कि चल नहाना है

घर के आँगन में कुएँ के जगत पे माँ बैठी
साबुन ओ पानी लिए मेरे इंतज़ार में थी
मुझको ऐसे रगड़-रगड़ के हाय नहलाया
गोया पाकीज़गी आती नहीं मुरव्वत से

सुन के रोना मेरा मौसी ने मुझे बहलाया
पोंछ के देह पिन्हाए मुझे नए कपड़े
खीर चम्मच से खिलायी तो वो मज़ा आया
कि एक और कटोरी गटक गया उस दिन

मैं कहाँ जानता था क्यों मुझे सजाया गया
मैं कहाँ जानता था आज कहाँ जाना है
मैं कहाँ जानता था क्यों नहीं पिता हैं यहाँ
चार पैसों के लिए शहर में मुलाजिम क्यों

मैं कहाँ जानता था हैं कहाँ मेरे बाबा
क्यों गए छोड़ उस जहाँ को जहाँ बीमारी
मैं कहाँ जानता था किस फ़लक से चश्म ए तर
देखते हैं मुझे भवभूति गुनगुनाते हुए

मैं कहाँ जानता था उनके पास ही ख़ुशरू
उनकी ईया भी मुस्कुराती हुई बैठी हैं
मायके से जो तह ए रूह लिए आयी थीं
गर्द ए इरफ़ान जो बड़गाँव* में फ़ना कब से

है मुझे याद मगर पहने हुए धोती-क़मीज़
थाम के हाथ मेरा ले चले मेरे चाचा
मैं कहाँ जानता था कौन सी डगर है वो
जो मेरे गाँव की गलियों से फूट जाएगी

अब नहीं है मगर मेरे ज़हन में ज्यों का त्यों
एक मड़वानुमा सादा-सा ख़ाक का घर वो
लाल खपड़ों की छवाई के तले दो कमरे
एक ओसारा चहुँ ओर घूमता था जो

चाचा लेकर गए उसकी पनाह में मुझको
वैद बाबा वहाँ बैठे थे एक कुर्सी पर
पैर छूकर चचा ने मुझको सिखाया आदाब
और मैंने भी कुतूहल से वही दुहराया

मेरे चाचा ने कहा क्या, वो मुझे याद नहीं
वैद बाबा ने कहा क्या, वो मुझे याद नहीं
बस यही याद है – हम सब ज़मीं पे बैठे हैं
एक कमरे में जहाँ नीमरोशनी में चिराग़

एक लीपी हुई दीवार याद आती है
और लीपा हुआ नम फ़र्श झलक जाता है
पर कोई बुत नहीं तस्वीर भी नहीं कोई
हम ख़ला में किसी ख़ला से मुख़ातिब से थे

और चाचा ने तभी पोटली खोली तो दिखा
छोटे चावल हैं चंद फूल डाट हल्दी की
एक पुड़िया में पड़ी तीन डली मिसरी की
और दो छोटे-बड़े सिक्के मुँह छुपाए हुए

वैद बाबा ने कहा – हाथ जोड़ लो बेटा
जल छिड़क मंत्र पढ़े, सर पे हथेली रख दी
और बोले कि हे बीना-किताब वाली माँ
आज से इस अबोध को शरण में ले ले तू

और फिर हाथ में खड़िया की डली पकड़ाकर
थाम कर हाथ मेरा स्लेट पे घुमाने लगे
याद है मुझको वो खड़िया का घुमाना अब तक
याद है मुझको तीन लफ़्ज़ लिखे थे मैंने

सोचता हूँ कि आजू बाज़ू होंगे ॐ नम:
बीच में जो बड़ा सा था वो नाम तेरा था
शारदा भारती कि सरस्वती जो भी है
स्लेट पे मैंने तुझे लफ़्ज़-सा उकेरा था

खड़िया छूने की रस्म, हो तो गयी थी पूरी
और उजरायी हथेली पे मिली मिसरी भी
पर मैं चुपचाप निकल आया था न जाने क्यों
मैं जो चींटी ज़बान – सब्र से बचाए हुए

तब कहाँ जानता था मोजज़ा हुआ है क्या
मुँहजुठी ज़हन की किस नूर के निवाले से
तब कहाँ जानता था फिर से पुकारूँगा तुझे
मैल में डूबी हुई रूह के उजाले से !

( अतफ़ाल- बच्चे, सिन – उम्र, बाद ए सबा- सुबह की हवा, ख़ुशरू – सुंदर, ईया – बाबा की माँ जो बड़गाँव की रहने वाली थीं, बड़गाँव में ही नालंदा विश्व विद्यालय। ग़र्द ए इरफ़ान – दिव्य ज्ञान की धूल। ख़ला – अनंत, मोजज़ा – चमत्कार)

Pawan Toon Cartoon

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