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चेन्नई की विजया रामचंद्रन की कहानी

विजया रामचंद्रन
विजया रामचंद्रन

प्रायः समाज में ऑटिज़्म की बीमारी से पीड़ित बच्चों की समस्याओं को उनके ही माँ-बाप के द्वारा अनदेखा कर दिया जाता है। यह सामाजिक विडम्बना ही है कि बच्चों के इन बीमारियों को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोर कर देखा जाता है, लोग स्वीकार ही नहीं करते कि बोलने और सुनने की समस्या भी एक बीमारी है और इसका उनके बच्चों के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने वाला है। आज हम एक ऐसी महिला की चर्चा कर रहा हूँ जिसने इस सामाजिक जटिलताओं को भली भांति समझती हैं। इसलिए उन्होंने इसके प्रति जागरूकता फैलाने, मां-बाप को इन मामलों में जवाबदेह बनाने, इसके रोकथाम करने तथा इलाज को सुगम बनाने का संकल्प लिया है। 

जीवन की नई परिभाषा गढ़ रही हैं चेन्नई की विजया रामचंद्रन

चेन्नई की रहने वाली विजया रामचंद्रन स्पीच लैंग्वेज पाथोलॉजिस्ट हैं। इनके जीवन का रोचक पहलू यह है कि जब इनका बेटा बड़ा हो गया, कॉलेज जाने लगा तब उसने ही अपनी माँ को यानी इन्हें कुछ नया करने को प्रेरित किया। एक महिला निरन्तर पारिवारिक-सामाजिक जवाबदेही को ढोती रहती है। इन्हीं जिम्मेवारियों के बीच उनका उम्र गुजर जाता है। उनको अपने जीवन का अर्थ पता ही नहीं चलता। लेकिन विजया रामचंद्रन के बेटे ने ही उन्हें अपने शौक के लिए कुछ करने को प्रेरित किया। 

चर्चित स्पीच पैथोलोजिस्ट हैं विजया रामचंद्रन

दरअसल, विजया रामचंद्रन चेन्नई के चर्चित स्पीच पैथोलोजिस्ट (Speech Pathologist) हैं। ये पिछले  27 सालों से इस फील्ड में काम कर रही हैं। 

ये ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों और उनके माता-पिता को इसके बारे में जागरूक करने के लिए काम कर रही है। लेकिन अपने काम को नए स्वरूप देने, अधिक से अधिक लोगों तक अपनी सेवा पहुंचाने के लिए इन्होंने कोविड के दौरान 2020 में सोशल मीडिया का पेशेवर रूप से इस्तेमाल करना शुरू किया। इस काम के लिए इनके बेटे ने इन्हें काफी उत्साहित किया। औऱ फिर इनके काम को सोशल मीडिया के कारण नया विस्तार मिला। 50 वर्षीय विजया नए-नए गतिविधियों के जरिए ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों का इलाज करती है एवं इन बच्चों के माता-पिता को जागरूक कर रही है।

कोविड के समय  लॉकडाउन की स्थिति में इन्होंने सोशल मीडिया का जमकर सदुपयोग किया। इन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप बनाया, अभिभावकों को जोड़ा। उन्होंने अभिभावकों को ऑनलाइन ट्रेनिंग दी कि कैसे पीड़ित बच्चों वर्क आउट करवाया जाए। उन्होंने बच्चों के सामाजिक व्यवहार से बीमार की गंभीरता को समझने तथा उसके रोकथाम के लिए बच्चों से वर्क आउट करवाने के लिए ट्रेनिंग दीं। उनके इस विशेष पहल के दो लाभ हुए। एक तो यह कि लॉकडाउन के कारण पीड़ित बच्चे समुचित इलाज से वंचित रह जाते, उनको इलाज मिल पाया। दूसरा यह कि इन्ही इलाजों के लिए परिवार वालों को भारी-भरकम खर्च करने पड़ते जो कि मुफ्त में ही मिल सका।

घर वालों को भी जागरूक किया

विजया बताती है कि ऑटिज़्म के खतरे को इसी से समझा जा सकता है कि हमारे देश में  यह प्रायः हर 70 में 1 बच्चे इसके शिकार हैं।  सोशल मीडिया में जरिए ये इस बीमारी से पीड़ित बच्चों के घर वालों से भी जुड़ सकी। और इस की भयावहता, इसके रोकथाम तथा उपचार के प्रति घर वालों को भी जागरूक किया। गौरतलब बात यह है कि हमारे समाज में अभी तक बीमार बच्चों की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी उसके मां की ही कंधों पर रहा करती है। विजया ने घर के अन्य सदस्यों को जैसे पिता, भाई, बहन, दादा-दादी आदि को भी जागरूक किया। नतीजन अब पीड़ित बच्चों की देखभाल में घर के दूसरे सदस्यों की भागीदारी बढ़ने लगी। वही मां के कंधे का बोझ भी कमने लगा।

इधर विजया मां को अपने स्वास्थ्य के लिए वक़्त निकालने के लिए प्रेरित करने लगी। इस तरह विजया की इस पहल से घर के माहौल में भी सकारात्मक बदलाव भी हुआ। बीमार बच्चे की पूरी जवाबदेही के साथ लगातार देख भाल करते करते माताओं का जीवन नकारात्मक विचारों से भर जाता है, उनमें हीनता का भाव बढ़ने लगता है। उधर परिवार भी इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर औरतों के नसीब से जोड़ देती है। इस तरह पीड़ित बच्चों की माताओं के मानसिक शोषण का एक नया दौर शुरू हो जाता है। निःसन्देह, विजया की इस पहल से कई घरों के विचार में बदलाव आया, कई माताएं डिप्रेशन से बाहर निकल कर अपने स्वास्थ्य और जीवन के प्रति सचेत हो सकीं।

पूरी तन्मयता से ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों की सेवा कर रही हैं

विजया रामचन्द्रन ईमानदारी और पूरी तन्मयता से ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों की सेवा कर रही हैं। वो बताती हैं कि सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं के लिए कदम-कदम पर लक्ष्मण रेखा खिंची गयी है। पूरी सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं का बोझ महिला ही ढोती है। इस बीच उन्हें पता ही नहीं चलता कि उनके जीवन का कितना हिस्सा खत्म हो चुका है। अपने होने के एहसास को कायम रखने के लिए कुछ अलग करना जरूरी है। वह अलग काम पारिवारिक जिम्मेदारियों से हटकर  होने चाहिए ताकि खुद के अस्तित्व का बोध हो सके।

विजया को इस बात का संतोष है कि आज बदलते परिवेश में सीनियर महिलाएँ भी अपनी अस्मिता के लिए जागरूक हो रही है। सीनियर महिलाओं में अपेक्षाकृत अधिक आत्मबल होता है। अधिक अनुभव और जवाबदही से नाता रखने के कारण उनमें आत्मबल तो रहता ही है लेकिन जटिल पारिवारिक वातावरण के कारण वो कुछ अलग नहीं कर पाती। पर आज कई महिलाओं ने इस चुनौती को स्वीकार किया है और जीवन के तीसरे पड़ाव पर खुद की अस्मिता के लिए कुछ करने का निर्णय लिया है। केवल युवा पीढ़ी ही नहीं, अब सीनियर महिलाएं भी धुन की पक्की हो रही हैं। कही खुल कर तो कही छुप कर अब बगावत होनी शुरू हो गयी है।

विजया बताती हैं कि वो जो काम कर रही है उसमें उन्हें पारिवारिक सहयोग मिल रहा है लेकिन यह सुखद संयोग देश की ज्यादातर सीनियर महिलाओं को नहीं नसीब है। हालांकि बदलाव हो रहा है भले ही उसकी गति अभी धीमी हो।
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