Shishir Somvanshi

विदाई शायरी

इस गली ने ये सुनके सब्र किया
जानेवाले यहां के थे ही नहीं
जून ईलिया

अब तो जाते हैं बुत-कदे से मीर
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया
मीर तक़ी मीर

उसको रुख़स्त तो किया था मुझे मालूम ना था
सारा घर ले गया, घर छोड़ के जाने वाला
निदा फ़ाज़ली

जानेवाले से मुलाक़ात ना होने पाई
दिल की दिल में ही रही बात ना होने पाई
शकील बद एवनी

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझको चाहेगा
बशीर बदर

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा
बशीर बदर

आँख से दूर सही दिल से कहाँ जाएगा
जानेवाले तू हमें याद बहुत आएगा
अबैदुल्लाह अलीम

जाते हो ख़ुदा-हाफ़िज़ हाँ इतनी गुज़ारिश है
जब याद हम आ जाएं मिलने की दुआ करना
जलील मानक पूरी

विदाई शायरी

अब तुम कभी ना आओगे, यानी कभी कभी
रुख़स्त करो मुझे कोई वादा किए बग़ैर
जून ईलिया

याद है अब तक तुझसे बिछड़ने की, वो अँधेरी शाम मुझे
तू ख़ामोश खड़ा था लेकिन बातें करता था काजल
नासिर काज़मी

ये एक पेड़ है आ इस से मिल के रो लें हम
यहां से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं
बशीर बदर

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सताएगा
बशीर बदर

तुम सुनो या ना सुनो, हाथ बढ़ाओ ना बढ़ाओ
डूबते डूबते इक बार पुकारेंगे तुम्हें
इर्फ़ान सिद्दीक़ी

छोड़ने मैं नहीं जाता उसे दरवाज़े तक
लौट आता हूँ कि अब कौन उसे जाता देखे
शहज़ाद अहमद

इस से मिलने की ख़ुशी बाद में दुख देती है
जश्न के बाद का सन्नाटा बहुत खलता है
मुईन शादाब

इस से मिले ज़माना हुआ लेकिन आज भी
दिल से दुआ निकलती है ख़ुश हो जहां भी हो
मुहम्मद अलवी

विदाई शायरी

गूँजते रहते हैं अलफ़ाज़ मेरे कानों में
तो तू आराम से कह देता है अल्लाह हाफ़िज़
नामालूम

उसे जाने की जल्दी थी सो में आँखों ही आँखों में
जहां तक छोड़ सकता था वहां तक छोड़ आया हूँ
नामालूम

अब के जाते हुए इस तरह किया उसने सलाम
डूबने वाला कोई हाथ उठाए जैसे
नामालूम

कलेजा रह गया उस वक़्त फट कर
कहा जब उल-विदा उसने पलट कर
पवन कुमार

मैं जानता हूँ मेरे बाद ख़ूब रोएगा
रवाना कर तो रहा है वो हंसते हंसते मुझे
अमीन शेख़

तुम इसी मोड़ पर हमें मिलना
लौट कर हम ज़रूर आएँगे
नामालूम

अजीब होते हैं आदाब रुख़स्ते महफ़ल
के वो भी उठ के गया जिसका घर ना था कोई
सह्र अंसारी

दुख के सफ़र पे दिल को रवाना तो कर दिया
अब सारी उम्र हाथ हिलाते रहेंगे हम
अहमद मुश्ताक़

विदाई शायरी

हमने माना इक ना इक दिन लौट के तू आ जाएगा
लेकिन तुझ बिन उम्र जो गुज़री, कौन उसे लौटाएगा
अख़तर सईद ख़ान

जानेवाले को कहाँ रोक सका है कोई
तुम चले हो तो कोई रोकने वाला भी नहीं
असलम अंसारी

ज़यादा ज़्यादा छोड़ जाओ अपनी यादों के नुक़ूश
आने वाले कारवां के रहनुमा बन कर चलो
नामालूम

वक़्त-ए-रुख़्सत अल-विदा का लफ़्ज़ कहने के लिए
वो तिरे सूखे लबों का थरथराना याद है
नामालूम

तेरे पैमाने में गर्दिश नहीं बाक़ी साक़ी
और तेरी बज़म से अब कोई उट्ठा चाहता है
प्रवीण शाकिर

वो अल-विदा का मंज़र वो भीगती पलकें
पस-ए-ग़ुबार भी किया-क्या दिखाई देता है
शकेब जलाली

एक दिन कहना ही था इक दूसरे को अल-विदा
आख़िरश सालिम जुदा इक बार तो होना ही था
सालिम शुजाअ अंसारी

रेल देखी है कभी सीने पे चलने वाली
याद तो होंगे तुझे हाथ हिलाते हुए हम
नोमान शौक़

विदाई शायरी

जानेवाले जा ख़ुदा-हाफ़िज़ मगर ये सोच ले
कुछ से कुछ हो जाएगी दीवानगी तेरे बग़ैर
मंज़र लखनवी

वक़्त-ए-रुख़्सत तेरी आँखों का वो झुक सा जाना
इक मुसाफ़िर के लिए ज़ाद-ए-सफ़र है ऐ दोस्त
नामालूम

ये घर मिरा गुलशन है गुलशन का ख़ुदा-हाफ़िज़
अल्लाह निगहबान नशेमन का ख़ुदा-हाफ़िज़
नामालूम

अब मुझको रुख़स्त होना है अब मेरा हार सिंघार करो
क्यों देर लगाती हो सखियो जल्दी से मुझे तैयार करो
शबनम शकील

ये हम ही जानते हैं जुदाई के मोड़ पर
इस दिल का जो भी हाल तुझे देखकर हुआ
नामालूम

क्यों गिरफ़्ता-दिल नज़र आती है ए शाम-ए-फ़िराक़
हम जो तेरे नाज़ उठाने के लिए मौजूद हैं
सर्वत हुसैन

जाते-जाते उनका रुकना और मुड़ कर देखना
जाग उठा आह मेरा दर्द-ए-तन्हाई बहुत
लुतफ़ हारूनी

बर्क़ क्या ,शरारा क्या, रंग क्या ,नज़ारा क्या
हर दिए की मिट्टी में रोशनी तुम्हारी है
नामालूम

विदाई शायरी

आई होगी तो मौत आएगी
तुम तो जाओ मेरा ख़ुदा-हाफ़िज़

चमन से रुख़्सत-ए-गुल है ना लौटने के लिए
तो बुलबलों का तड़पना यहां पे जायज़ है
नामालूम

लगा जब यूं कि उकताने लगा है दिल उजालों से
उसे महफ़िल से ، उसकी अल-विदा कह कर निकल आए
परविन्द्र शोख़

आब-दीदा हो के वो ,आपस में कहना अलविदाई
उसकी कम मेरी सवा आवाज़ भराई हुई
प्रवीण उम मुश्ताक़

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