उम्मीद पर शायरी

उम्मीद पर शायरी

हमको उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा किया है
मिर्ज़ा ग़ालिब
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तपते हुए सहरा में भी बारिश की थी उम्मीदें
बेहद था यक़ीं मुझको यूं अपनी दुआओं का
नदीम भाभा
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नहीं है नाउम्मीद इक़बाल अपनी किश्त-ए-वीराँ से
ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी
अल्लामा इक़बाल
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दिल नाउम्मीद तो नहीं , नाकाम ही तो है
लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

उम्मीद पर शायरी


मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी स्याह समुंद्र से नूर निकलेगा
अमीर क़ज़लबाश
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ना कोई वादा ना कोई यक़ीं ना कोई उम्मीद
मगर हमें तो तेरा इंतिज़ार करना था
फ़िराक़-गोरखपुरी
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अब तक दिल ख़ुश-फ़हम को तुझसे हैं उम्मीदें
ये आख़िरी शमएँ भी बुझाने लिए आ
अहमद फ़राज़
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यूं तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
शकील बदायूंनी

उम्मीद पर शायरी


ख़ाब, उम्मीद, तमन्नाएं, ताल्लुक़, रिश्ते
जान ले लेते हैं आख़िर ये सहारे सारे
इमरान उल-हक़ चौहान
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साया है कम खजूर के ऊंचे दरख़्त का
उम्मीद बाँधिए ना बड़े आदमी के साथ
कैफ़ भोपाली
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एक चिराग़ और एक किताब और एक उम्मीद असासा
इस के बाद तो जो कुछ है वो सब अफ़साना है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
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शाख़ें रहें तो फूल भी पत्ते भी आएँगे
ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे

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