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हौसलों की आकाशगंगा : श्रद्धा पडगांवकर

श्रद्धा पडगांवकर
श्रद्धा पडगांवकर

आज हम एक ऐसी संघर्ष की कहानी सुनाने जा रहे हैं जो आप के रोंगटे खड़े कर सकती है। मुंबई में रहने वाली श्रद्धा पडगांवकर की कहानी साहस और जुनून की जीत की कहानी है जो निस्संदेह आज हज़ारों लड़कियों को अपने लिए जीवन जीने के लिए प्रेरित कर सकती है। आज कल के युवा जो एकाध सपने टूटने या किसी व्यक्ति से धोखा मिलने के बाद आत्महत्या करने की सोच लेते हैं उन सभी को मुंबई की बेटी श्रद्धा पडगांवकर की कहानी को जानना चाहिए और यह सीखना चाहिए कि चाहे कितना भी हार हो जाए, चाहे लाख चुनौतियां आ जाए लेकिन आपका जीवन बहुत अनमोल है, किसी भी परिस्थिति में आत्महत्या कर आप अपने साथ न्याय नहीं कर सकते।

कर्जे के बोझ से शुरू हुआ शोषण का दुष्चक्र

श्रद्धा पडगांवकर का जन्म मुंबई के ब्राह्मण परिवार में हुआ है। इनका परिवार रूढ़िवादी नहीं है लेकिन लोक-लज्जा की परवाह करने वाला जरूर रहा जहां लड़कियों को शाम ढलते घर आना होता है। इनका बचपन बीमारी के घेरे में बीता। इन्हें बार-बार उल्टी होने की शिकायत रही । डॉक्टर इस बीमारी का कारण तो नहीं समझ पाए लेकिन इनके स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए इनके खेलने कूदने, घूमने आदि पर रोक लगाई गयी। इससे इनका बचपन आम बच्चों की तरह उछल-कूद में नहीं व्यतीत हुआ।

श्रद्धा पडगांवकर के पिता बिजनेस मैन थे। इस बीमारी के बावजूद घर में खुशहाली थी लेकिन धीरे धीरे इनके पिता का बिजनेस हानि में जाने लगा, कर्जे का बोझ बढ़ने लगा। फिर शुरू हुआ शोषण का एक ऐसा चक्रव्यूह जिसमे आज तक पूरा परिवार फसा पड़ा है। कर्जा वसूलने वाले घर पर बरबस आ धमकते। इनके पिता को धमकियां मिलती। लोग इन पर और इनकी बहन पर अश्लील टिप्पणी भी करते। राह चलना दूभर हो गया।

फिर इनके परिवार का सम्पर्क नागपुर के एक अमीर परिवार के वकील से हुई। उसने इनके साथ शादी का प्रस्ताव रखते हुए इनके परिवार के पूरे कर्जे चुकाने, कानूनी मदद पहुचाने औऱ परिवार का ख्याल रखने का दावा किया। उस समय श्रद्धा की उम्र मात्र 19 साल की थी और उस लड़के की 30 साल। इस बेमेल उम्र के बावजूद परिवार की सुरक्षा मिलने की नीयत से श्रद्धा शादी के लिए तैयार हो गई। लेकिन इसी बीच लड़के का एक्सीडेंट हो गया जिसमें वो घायल हो गया। लड़का परिवार वालों से दूर नागपुर की अपनी फार्म हाउस में रहता था। इधर इनके घर में कर्जा वसूलने के नाम पर आने वाले लोगों का शोषण जारी था । इसलिए ये सुरक्षा के नाम पर लड़के ने शादी के पहले ही इन्हें अपने फार्म हाउस बुला लिया।

मंगेतर ने पोर्न फिल्म में काम करने के लिए धमकाया

एक दिन रात को जब इनके कमरे की बिजली गुम हुई तो श्रद्धा जब कमरे से बाहर निकल कर भटकते भटकते जब हवेली के दूसरे छोर वाली कमरे में गयी तो वहां जो हो रहा था उसे देख कर ये सन्न रह गई, इनके पांव से जमीन खिसक गई। दरअसल, वहां पोर्न फिल्म की एडिटिंग हो रही थी। वहां लगे स्क्रीन पर कई लड़कियां पूरी तरह से नग्न दिखाई दे रही थी। श्रद्धा को वहां अचानक देख वह लड़का गुस्से में धमकियां देने लगा। बोला कि मैं पोर्न फिल्म का धंधा करता हूँ, तुम्हें भी इसमें काम करना पड़ेगा, वरना तुम्हारे पूरे परिवार को खत्म कर दूंगा। बाद में, श्रद्धा अपने भाई के सहयोग से किसी तरह भाग गई और बंगलौर आ गई।

बंगलौर में उन्होंने बहुत ही कम पैसे की नौकरी की।


वहां भी उन्हें परेशान किया गया। जिन्हें भी यह पता चलता कि यह लड़की अकेली रह रही है वो इन्हें गलत नियत से देखता। कई बात तो छेड़छाड़ की नौबत भी आई जिसका इन्होंने बहुत ही मजबूती से सामना किया। कुछ समय बाद इन्होंने बंगलौर में एक दूसरे लड़के से प्रेम विवाह किया। विवाह के बाद उस लड़के के द्वारा शोषण का एक नया सिलसिला शुरू हुआ। ये जब भी गर्भवती होतीं बच्चे गिरवाने के लिए दवाईयां खाने को विवश किया जाता। ये दो बार गर्भवती हुई और इन्हें दोनों बार बच्चे गिरवाने के लिए बाध्य किया गया, इसके लिए दवाईयां खानी पड़ी। ससुराल में इनके चरित्र पर लांछन लगाया जाता रहा। काम के सिलसिले में अगर ये किसी लड़के से बात करती तो
उन्हें शक की नज़र से देखा जाता था। बाद में इन्होंने पति से अलग रहने का फैसला किया।

अकेले रहने की ठानी और बदल ली अपनी जिंदगी

अब श्रद्धा ने तय किया कि वो अब शादी नहीं करेंगी औऱ अपनी बहन के बेटे को गोद लेंगी। नसीब का खेल ऐसा हुआ कि उस बच्चे को कैंसर हो गया औऱ महज 10 साल की उम्र में उसका निधन हो गया। इस घटना से श्रद्धा अंदर से टूट चुकी थी। लेकिन धीरे धीरे अपने को संभाला।

आज श्रद्धा एक प्रतिष्ठित निजी कंपनी में कारपोरेट मैनेजर हैं। साथ ही एनिमल रेस्क्यू का काम भी करती हैं। कुछ कुत्ते, बिल्लियों को पालना इनका शौक है। सड़क के लावारिस और जरूरतमंद जानवरों की सेवा करना, जैसे भोजन, दवा आदि की सुविधा मुहैया करवाती हैं। वो लाइफ कोच के रूप में भी काम करती हैं। उन्होंने ऐसे कई लड़कियों को मोटिवेट भी किया है जो कभी आत्महत्या का प्रयास करती थी।

श्रद्धा पडगांवकर का मानना है कि हम लड़कियों को समय रहते ‘ना’ कहना सीखना चाहिए। वरना शोषण का दुष्चक्र शुरू हो जाता है। अपने शरीर पर दूसरों के नियंत्रण को अस्वीकार करना ही होगा। दरअसल समाज में पवित्रता, चरित्र की ऐसी परिभाषा बनाई गई है जिसमें महिलाओं के शरीर पर से उसके खुद के हक को छीना गया है। हमें अपने ही मां बाप द्वारा ‘मुंह काला होना’ जैसी मान्यता से धमकाया जाता है। अगर लड़कियों का किसी से शारीरिक संबंध बनता है तो उसे सिर्फ इसलिए नहीं ढोते रहना चाहिए कि हम उसके साथ शारिरिक सम्बंध बना चुके हैं। अब किसी दूसरे जीवन साथी की तलाश करना अपना मुंह काला करवाना हो गया। हमारी अपनी पहचान, अपनी सुरक्षा इन मान्यताओं से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

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