तिश्नगी/प्यास पर शायरी

तिश्नगी / प्यास पर शायरी

अब तो इतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में
दिवाकर राही

बहुत ग़रूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएं
राहत इंदौरी

पीता हूँ जितनी उतनी ही बढ़ती है तिश्नगी
साक़ी ने जैसे प्यास मिला दी शराब में
नामालूम

साक़िया तिश्नगी की ताब नहीं
ज़हर दे दे अगर शराब नहीं
दाग़ देहलवी

वो जो प्यासा लगता था सैलाब ज़दा था
पानी पानी कहते कहते डूब गया है
आनिस मुईन

ऐसी प्यास और ऐसा सब्र
दरिया पानी पानी है
विकास शर्मा राज़

कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो
शबनम का क़तरा भी जिनको दरिया लगता है
क़ैसर अलजाफ़री

तिश्नगी/प्यास पर शायरी

प्यास बढ़ती जा रही है बहता दरिया देखकर
भागती जाती हैं लहरें ये तमाशा देखकर
साक़ी फ़ारूक़ी

वो सामने हैं मगर तिश्नगी नहीं जाती
ये क्या सितम है कि दरिया सराब जैसा है
नामालूम

कमाल तिश्नगी ही से बुझा लेते हैं प्यास अपनी
इसी तपते हुए सहरा को हम दरिया समझते हैं
जिगर मुरादाबादी

रूह किस मस्त की प्यासी गई मय-ख़ाने से
मय उडी जाती है साक़ी तेरे पैमाने से
दाग़ देहलवी

साक़ी मेरे भी दिल की तरफ़ टुक निगाह कर
लबे-तिश्ना तेरी बज़म में ये जाम रह गया
ख़्वाजा मीर दर्द

आज पी कर भी वही तिश्ना-लबी है साक़ी
लुतफ़ में तेरे कहीं कोई कमी है साक़ी
आल-ए-अहमद सरवर

जिसे भी प्यास बुझानी हो मेरे पास रहे
कभी भी अपने लबों से छलकने लगता हूँ
फ़र्हत एहसास

तिश्नगी/प्यास पर शायरी

साक़ी मुझे ख़ुमार सताए है, ला शराब
मरता हूँ तिश्नगी से ऐ ज़ालिम पिला शराब
शेख़ ज़हूर उद्दीन हातिम

दो दरिया भी जब आपस में मिलते हैं
दोनों अपनी अपनी प्यास बुझाते हैं
फ़ारिग़ बुख़ारी

हर्फ़ अपने ही मआनी की तरह होता है
प्यास का ज़ायक़ा पानी की तरह होता है
फ़ैसल अजमी

फिर उस के बाद हमें तिश्नगी रहे ना रहे
कुछ और देर मुरव्वत से काम ले साक़ी
कँवर महिन्द्र सिंह बेदी सहर

वो मजबूरी मौत है जिसमें कासे को बुनियाद मिले
प्यास की शिद्दत जब बढ़ती है डर लगता है पानी से
मुहसिन इसरार

प्यास की सलतनत नहीं मिटती
लाख दजले बना फुरात बना
ग़ुलाम अहमद क़ासिर

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