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तन्हाई पर शायरी

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तन्हाई पर शायरी
तन्हाई पर शायरी

तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझपे गुज़रे ना क़ियामत शब-ए-तन्हाई की
परवीन शाकिर
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तेरे होते हुए आ जाती है सारी दुनिया
आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला
अहमद फ़राज़
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वीरानी सी वीरानी है तन्हाई सी तन्हाई
पहले टूट के रोने वाला अब ख़ामोश तमाशाई है
राशिद साहिल
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मैं हूँ दिल है तन्हाई है
तुम भी होते अच्छा होता
फ़िराक़-गोरखपुरी
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तन्हाई में करनी तो है इक बात किसी से
लेकिन वो किसी वक़्त अकेला नहीं होता
अहमद मुश्ताक़
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आज तन्हाई ने थोड़ा सा दिलासा जो दिया
कितने रूठे हुए साथी मुझे याद आए हैं
मुहसिन नक़वी
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उदासी, शाम-ए-तन्हाई, कसक, यादों की बेचैनी
मुझे सब सौंप कर सूरज उतर जाता है पानी में
अलीना इतरत
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तन्हाई पर शायरी


दूर है मंज़िल, राहें मुश्किल, आलम है तन्हाई का
आज मुझे एहसास हुआ है अपनी शिकस्ता-पाई का
नूर कंवल

हम वो तन्हाई पे लिखे हुए अशआर जिन्हें
कोई महफ़िल में सुनाते हुए रो देता है
मंज़र भोपाली
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अपने होने का कुछ एहसास ना होने से हुआ
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ
मुसव्विर सबज़वारी
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अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है
कोई आ जाये तो वक़्त गुज़र जाता है
ज़हरा निगाह
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ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ
हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते
उम्मीद फ़ाज़ली
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एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा
निदा फ़ाज़ली
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तन्हाइयाँ तुम्हारा पता पूछती रहीं
शब-भर तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया
नामालूम
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तन्हाई पर शायरी


कोई भी घर में समझता ना था मेरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
राजेंद्र मनचन्दा बानी
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मैं अपने साथ रहता हूँ हमेशा
अकेला हूँ मगर तन्हा नहीं हूँ

ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में
तेरी याद आँखें दिखाने लगी
आदिल मंसूरी
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कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता
तुम ना होते ना सही ज़िक्र तुम्हारा होता
अख़तर शीरानी

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मेरी तन्हाई को मेरा शौक़ ना समझना
बहुत प्यार से दिया है ये तोहफ़ा किसी ने
मुर्तज़ा यकसूई
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दिल परेशां है शब-ओ-रोज़ की यक-रंगी से
कल भी तन्हाई थी और आज भी तन्हाई है
मुहम्मद अली
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तन्हाई पर शायरी


शहर में किस से सुख़न रखीए किधर को चलीए
इतनी तन्हाई तो घर में भी है घर को चलीए
नसीर तुराबी
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बना रखी हैं दीवारों पे तस्वीरें परिंदों की
वगरना हम तो अपने घर की वीरानी से मर जाएं
अफ़ज़ल ख़ान
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वो नहीं है ना सही तर्क-ए-तमन्ना ना करो
दिल अकेला है उसे और अकेला ना करो
महमूद अय्याज़
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मैं सोते सोते कई बार चौंक चौंक पड़ा
तमाम रात तेरे पहलूओं से आँच आई
नासिर काज़मी

दिल की तन्हाई को आवाज़ बना लेते हैं
दर्द जब हद से गुज़रता है तोगा लेते हैं

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