mirza ghalib shairi

aleena itrat

अलीना इतरत की ग़ज़ल

शाम के वक़्त चिराग़ों सी जलाई हुई मैंघुप अन्धेरों की मुन्डेरों पे सजाई हुई मैं देखने वालों की नज़रों को लगूँ सादा वरक़तेरी तहरीर में हूँ ऐसे छुपाई हुई मैं ख़ाक कर के मुझे सहरा में उड़ाने वालेदेख रक़्साँ हूँ सरे दश्त उड़ाई हुई मैं लोग अफ़साना समझ कर मुझे सुनते ही रहेदर हक़ीक़त हूँ …

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ज़िन्दगी पर शायरी

ज़िन्दगी पर शायरी

जो गुज़ारी ना जा सकी हमसेहमने वो ज़िंदगी गुज़ारी हैजून ईलिया ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मींपांव फीलाओं तो दीवार में सर लगता हैबशीर बदर होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ हैइशक़ कीजिए फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ हैनिदा फ़ाज़ली ज़िंदगी ज़िंदा-दिल्ली का है नाममुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैंइमाम …

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