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विनय कुमार

कविता : खड़िया छूना

(मेरे गाँव में विद्यारंभ को खड़िया छूना कहते थे ) कवि: विनय कुमार याद आता है वो पाकड का फैला-फैला दरख़्तयाद आते हैं वो अतफ़ाल जो मेरी सिन केयाद आता है वो गर्द ओ ग़ुबार का चंदनयाद आते हैं कई खेल जो भुल...

बाल कविता /Baal Kavita

बाल कविता

अब मैं भी पढूँगा कवि: डॉ अभिषेक कुमार कंसल्टेंट नेत्र विशेषज्ञ बलिया , बेगूसराय , बिहार पापा – पापा मुझको भी एक स्लेट ला दीजियेमेरा भी बहुत मन कर रहा अब मैं भी पढूँगापढ़ – लिख कर खुद एक अच्...

कब जागोगे!

कब जागोगे!

कब जागोगे! कवि: मिन्हाज रिज़वी रात मैं न्यूज़ देखते देखते कब सो गया मुझे पता ही नहीं चलायह रात मुझ पर बहुत भारी गुज़रीयह मेरा अंतर्द्वंद था कल्पना थी यथार्थ था या मात्र मेरा सपनाबहर हाल जो भी था भयावह था...