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स्वप्निल तिवारी

चाँद डिनर पर बैठा है: एक संक्षिप्त विश्लेषण

स्वप्निल तिवारी की कविताओं का यह संग्रह “चाँद डिनर पर बैठा है” पढ़कर मन प्रसन्न हो गया। इनकी ग़ज़लों में शायरी का सौन्दर्य इतने ऊँचे स्तर पर है कि पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह चाँद के साथ रात का खाना खा रहा है। चंद्रमा एक प्राकृतिक घटना है, और सोपानल तिवारी की कविता …

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विनय कुमार

कविता : खड़िया छूना

(मेरे गाँव में विद्यारंभ को खड़िया छूना कहते थे ) कवि: विनय कुमार याद आता है वो पाकड का फैला-फैला दरख़्तयाद आते हैं वो अतफ़ाल जो मेरी सिन केयाद आता है वो गर्द ओ ग़ुबार का चंदनयाद आते हैं कई खेल जो भुलाए गए याद आती है वो बाद ए सबा सी उड़ती सुबहजब मुझे …

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कब जागोगे!

कब जागोगे!

कब जागोगे! कवि: मिन्हाज रिज़वी रात मैं न्यूज़ देखते देखते कब सो गया मुझे पता ही नहीं चलायह रात मुझ पर बहुत भारी गुज़रीयह मेरा अंतर्द्वंद था कल्पना थी यथार्थ था या मात्र मेरा सपनाबहर हाल जो भी था भयावह थास्शुरुआत महाभारत थी कुरुक्छेत्र का मैदान था दोनों ओर भाई थे लड़ाई का कारण सत्ता …

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Poet: Saleem Javed

सलीम जावेद की ग़ज़ल

ग़ज़ल कवि:सलीम जावेद वहशत से नारसाई से ग़म से फि़राक़ सेइन सब से वास्ता है मिरा इत्तेफा़क़ से इंसानियत के प्यार के महरो खुलूस केगा़यब हैं सब चराग़ मिरे घर के ताक़ से मैं ने विसाल लिख दिया कल आसमान परखु़श हो गया है चांद मिरे इश्तियाक़ से इक रास्ता रुजूअ का है दरमियां मगरदिल …

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पानी पर शायरी

पानी पर शायरी

ये समुंद्र ही इजाज़त नहीं देता वर्नामैंने पानी पे तेरे नक़्श बना देने थे۔आँख में पानी रखूँ , होंटों पे चिंगारी रखूँज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखूँराहत इंदौरी۔मेरी तन्हाई बढ़ाते हैं चले जाते हैंहंस तालाब पे आते हैं चले जाते हैंअब्बास ताबिश۔एक निशानी ये उसके के गाँव कीहर नलके का पानी मीठा होता …

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चाय पर शायरी

चाय पर शायरी

हमसे नफ़रत कुछ यूं भी निभाई गईहमारे सामने चाय बना के औरों को पिलाई गईनामालूम۔चाय मेरी ज़िंदगी में लाज़िम है ऐसेआशिक़ को महबूब का दीदार हो जैसेनामालूम ۔पुरतकल्लुफ़ सी महकती वो सुहानी चायअब कहाँ हमको मयस्सर है तुम्हारी चायनामालूम۔फूल, एलबम, शायरी, चायज़ात बिखरी पड़ी है कमरे मेंनामालूम۔ढलती शाम, गहरे सायभीगी आँखें, मैं और चायज़ीशान साजिद …

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किताब पर शायरी

किताब पर शायरी

ये जो ज़िंदगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब हैकहीं एक हसीन सा ख़ाब है कहीं जान-लेवा अज़ाब हैराजेश रेड्डी۔कोई सूरत किताब से निकलेयाद सूखे गुलाब से निकलेसमीर कबीर۔जब भी कोई किताब लिखूँगातेरे नाम इंतिसाब लिखूँगामुईन शादाब۔उसका लहजा किताब जैसा हैऔर वो ख़ुद गुलाब जैसा हैजाज़िब क़ुरैशी۔दर्द की इक किताब है कोईज़िंदगी इज़तिराब …

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तिश्नगी/प्यास पर शायरी

तिश्नगी / प्यास पर शायरी

अब तो इतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने मेंजितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने मेंदिवाकर राही बहुत ग़रूर है दरिया को अपने होने परजो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएंराहत इंदौरी पीता हूँ जितनी उतनी ही बढ़ती है तिश्नगीसाक़ी ने जैसे प्यास मिला दी शराब मेंनामालूम साक़िया तिश्नगी की ताब नहींज़हर दे दे …

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प्यास पर शायरी

प्यास पर शायरी

मुझे ये फ़िक्र सबकी प्यास अपनी प्यास है साक़ीतुझे ये ज़िद कि ख़ाली हैमेरा पैमाना बरसों सेमजरूह सुलतानपुरी ऐसी प्यास और ऐसा सब्रदरिया पानी पानी हैविकास शर्मा राज़ नहीं बुझती है प्यास आँसू सें लेकिनकरें क्या अब तो याँ पानी यही हैसिराज औरंगाबादी जिसे भी प्यास बुझानी हो मेरे पास रहेकभी भी अपने लबों से …

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अखिलेश तिवारी की ग़ज़ल

गुनाह पर शायरी

कोई समझे तो एक बात कहूंइशक़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहींफ़िराक़-गोरखपुरी इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिनदेखे हैं हमने हौसले परवरदिगार केफ़ैज़ अहमद फ़ैज़ यूं ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैरजैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैंजिगर मुरादाबादी इस भरोसे पे कर रहा हूँ गुनाहबख़श देना तो तेरी फितरत हैनामालूम मेरे गुनाह ज़्यादा हैं …

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