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hindi poetry about koshish

कब जागोगे!

कब जागोगे!

कब जागोगे! कवि: मिन्हाज रिज़वी रात मैं न्यूज़ देखते देखते कब सो गया मुझे पता ही नहीं चलायह रात मुझ पर बहुत भारी गुज़रीयह मेरा अंतर्द्वंद था कल्पना थी यथार्थ था या मात्र मेरा सपनाबहर हाल जो भी था भयावह था...

कोशिश पर शायरी

कोशिश पर शायरी

कोशिश भी कर उम्मीद भी रख रास्ता भी चुनफिर उस के बाद थोड़ा मुक़द्दर तलाश करनिदा फ़ाज़ली और थोड़ा सा बिखर जाऊं , यही ठानी हैज़िंदगी मैंने अभी हार कहाँ मानी हैहसनैन आकिब आख़िरी कोशिश भी करके देखते हैंफिर...