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gham par shairi

aleena itrat

अलीना इतरत की ग़ज़ल

शाम के वक़्त चिराग़ों सी जलाई हुई मैंघुप अन्धेरों की मुन्डेरों पे सजाई हुई मैं देखने वालों की नज़रों को लगूँ सादा वरक़तेरी तहरीर में हूँ ऐसे छुपाई हुई मैं ख़ाक कर के मुझे सहरा में उड़ाने वालेदेख रक़्स...

ग़म पर शायरी

ग़म पर शायरी

दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो हैलंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो हैफ़ैज़ अहमद फ़ैज़ कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाबआज तुम याद बे-हिसाब आएफ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएं कैसेतेरी मर...