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December Poetry in Hindi

कब जागोगे!

कब जागोगे!

कब जागोगे! कवि: मिन्हाज रिज़वी रात मैं न्यूज़ देखते देखते कब सो गया मुझे पता ही नहीं चलायह रात मुझ पर बहुत भारी गुज़रीयह मेरा अंतर्द्वंद था कल्पना थी यथार्थ था या मात्र मेरा सपनाबहर हाल जो भी था भयावह था...

सर्दी पर शायरी

सर्दी पर शायरी

अब उदास फिरते हो सर्दीयों की शामों मेंइस तरह तो होता है इस तरह के कामों मेंशुऐब बिन अज़ीज़ ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझहम अपने शहर में होते तो घर गए होतेउम्मीद फ़ाज़ली कुछ तो हवा भी सर्द थी कु...