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स्वतंत्र पत्रकारिता की एक अनुकरणीय कोशिश

स्वतंत्र पत्रकारिता की एक अनुकरणीय कोशिश
स्वतंत्र पत्रकारिता की एक अनुकरणीय कोशिश

आसमानी तथा लोकलुभावन मुद्दों की पत्रकारिता की शोर तो आप सब बरबस सुनते ही रहते होंगे लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शहरों से कोसों दूर गांव-देहात के लोगों के मुद्दों की बात आज के तथाकथित मुख्य धारा की पत्रकारिता में क्यों नहीं होती ! सीधी सपाट बात है, इस तरह के मुद्दों की पत्रकारिता से वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होता, आर्थिक लाभ नहीं होता या राजनीतिक गलियारों में इसे पढ़ा नहीं जाता। ऐसे में गांव-देहात से जुड़े जन सरोकार के ढेरों मुद्दें गुम हो जाते है। लेकिन इन तमाम तर्क-वितर्कों से परे कानपुर देहात जिले की एक बेटी नीतू सिंह की स्वतंत्र पत्रकारिता की कोशिश अनुकरणीय प्रतीत होती है।

न्यूनतम बजट पर पत्रकारिता का हुनर

नीतू सिंह Shades of Rural India सोशल पेज के जरिए स्वतंत्र पत्रकार के रूप में न्यूनतम बजट पर पत्रकारिता कर रही हैं। ये दूर दराज के गांवों में जाकर लोगों के मुद्दों को उठाती हैं। नीतू अभी तक यूपी, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड और झारखंड के उन सैकड़ों गांवों में जाकर जन सरोकार के विषयों पर बात कर चुकी हैं जहां आज तक न बिजली पहुंची हैं न सड़क। वो अपनी रिपोर्टिंग में ग्रामीण भारत के यथार्थ को दिखाने का प्रयास करती हैं। 

गांवों का आवागमन आज भी चुनौतियों भरा है

सबसे बड़ी बात यह है कि देश के गांवों का आवागमन आज भी चुनौतियों से भरा होता है। न तो हर जगह पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा होती है न खाने। होटल या कहीं ठहरने की तो बात ही नहीं! ऐसे में अकेले किसी पुरुष पत्रकार का गांवों में जाकर रिपोर्टिंग करना आसान नहीं होता। इस परिस्थिति में एक अकेली लड़की का अपने दम पर देश के गांवों में जाना कोई आसान काम नहीं है। साल 2020 के ‘चमेली देवी जैन पुरस्कार’ से सम्मानित नीतू सिंह बताती है कि ऐसा नहीं है कि गांवों में घूम-घूम कर पत्रकारिता करने के निर्णय लेने से पहले वो ग्रामीण पत्रकारिता की चुनौतियों से परिचित नहीं थीं। लेकिन गांवों की महिलाओं, बच्चों, आदिवासियों तथा भारतीय ग्रामीण परिवेश को समझने की ललक ने उन्हें हमेशा उत्साह दिया है। 

सोशल मीडिया के परिचितों के जरिए ग्रामीण इलाकों की रिपोर्टिंग की

शुरुवाती दिनों में नीतू ने अपने सोशल मीडिया के परिचितों के जरिए मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों की रिपोर्टिंग की, धीरे-धीरे अब जब लोग इनके काम को जानने लगे तब खुद ही कई लोग गांवों के लोग अपने यहां के मुद्दों पर बात करने के लिए इन्हें बुलाने लगे। और अब यह सिलसिला बन गया। 

नीतू सिंह अपनी पत्रकारिता को जीरो बजट पत्रकारिता कहना चाहती हैं। वो बताती हैं कि परिचित मित्रों के सहयोग से तय गांवों में  एक ग्रामीण की भांति मामूली खर्च से यात्रा करती है। कही बस, ऑटो आदि पब्लिक ट्रांसपोर्ट से तो कही पगडंडियों पर पैदल यात्रा कर गांव तक जाती हैं। इन्हें गांवों के लोगों का भरपूर स्नेह भी मिलता है। कई लोग अपने यहां ठहरने या भोजन करने के लिए भी कहते हैं।

नीतू सिंह

अकेली लड़की गांव-गांव कैसे घूमा करती है?

जो लोग नीतू सिंह की प्रतिभा और काम के प्रति समर्पण को पचा नहीं सकते वो इनसे सवाल भी पूछते हैं। जैसे अकेली लड़की गांव-गांव कैसे घूमा करती है? घर के लोग रोकते क्यों नहीं? जिस काम में पैसा नहीं है वह काम क्यों करती हैं ? …आदि कई सवाल! खैर, इन सवालों से नीतू सिंह के काम में कोई रुकावट नहीं हुई। 

निसन्देह, नीतू सिंह की यह पहल पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों के लिए अनुकरणीय है। ये स्वतंत्र पत्रकारिता की एक नई तस्वीर उकेरने की कोशिश है।

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