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क्या कांग्रेस एक दलित नेता को हाईलाइट करके सही दिशा में जा रही है?

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2014 में सत्ता गंवाने के बाद से कांग्रेस नेतृत्व संकट से गुजर रही है। नई प्रतिभाएं कांग्रेस में अक्सर अनदेखी का शिकार रहती हैं। आलम यह है कि पार्टी के पास आज राज्य स्तर पर भाजपा से लड़ने के लिए एक भी युवा नेता नहीं है। यह स्थिति इसलिए पैदा हो गई कि देश के किसी भी हिस्से में कांग्रेस के उम्मीदवार को उतारना हो तो नई दिल्ली के कांग्रेस आला कमान के पसंदीदा उम्मीदवार ही विरोधियों के खिलाफ उतारे जाते हैं। संकट इतना गहरा है कि पार्टी के भीतर से भी उभरे प्रतिभाशाली युवा नेताओं की अनदेखी की जाती है।

सबसे दुखद पहलू तो यह है कि कांग्रेस न तो अपने ही युवा प्रतिभाओं के महत्व को समझ पाती न ही उन पर विश्वास करती है । ऐसे कई नेता इस बात के उदाहरण हैं कि उन्हें उस वक्त पार्टी से निकाल दिया गया जब उनकी लोकप्रियता जनमानस में बढ़ रही थी क्षेत्रीय जनता का उनके नेतृत्व पर विश्वास बढ़ रहा था। ममता बनर्जी (Mamta Banerjee)और वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी (Y. S. Jagan Mohan Reddy)इसके सबसे अच्छा उदाहरण हैं। फिर भी पार्टी का दिल्ली आलाकमान अभी भी ज्यादातर ऐसे लोगों के सलाह पर काम करता है जिनकी ज़मीनी स्तर पर कोई पकड़ नहीं है।

गांधी परिवार ने कांग्रेस पार्टी को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाया

नेहरू,गांधी परिवार ने कांग्रेस(Congress0 पार्टी को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाया, हर क्षेत्र के उभरते नेतृत्व और अनुभवी नेतृत्व से जोड़ा। लेकिन इंदिरा गांधी के के मजबूत नेतृत्व कौशल में एक कमी रह ही गई। वो पार्टी को जमीनी स्तर के नेताओं से नहीं जोड़ पाए। उनसे सही मायने में वंश परम्परा की शुरुआत हो गयी। और राजीव, संजय से होते हुए आज सोनिया, राहुल(Rahul Gandhi ) और प्रियंका( Priyanka Gandhi ) के अनुभवहीन नेतृत्व तक आ गयी। इनमें से किसी के पास आरएसएस/भाजपा(RSS) जैसे खतरनाक लेकिन अनुभवी दुश्मनों को हराने के लिए आवश्यक राजनीतिक, सामाजिक तथा वैचारिक क्षमता नहीं है।

इंदिरा गांधी (Indira Gandhi )देश की सामाजिक, राजनीतिक संरचना को भलीभांति समझने बिना ही पार्टी के।नेतृत्व को अपने हाथों में ले लीं। उन्हें देश के गांव, शहरों के लोगों के मिजाज का अनुभव ही नहीं था। यह वक्त रहा जब नेहरू के जमाने के कांग्रेसी एक-एक राजनीति से अलग होते गए। उसके बाद इंदिरा कांग्रेस में कुछ राजनीति के सैद्धांतिक जानकारों की टोली (ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ, खत्री और क्षत्रिय) जिसे बुद्धिजीवियों का समूह कहा जा सकता है, ने पार्टी में प्रवेश किया। फिर पार्टी का हर निर्णय इन्हीं लोगों के सलाह पर दिल्ली वाले आलाकमान के दिए आदेशों पर होने लगा।

ये बुद्धिजीवी राज्य सभा के माध्यम से ड्राइविंग सीट में प्रवेश करते हैं और मंत्रालयों का नेतृत्व हथिया लेते हैं। यहां गांधी परिवार की निकटता से इनके पार्टी में कद, सीट और मंत्रालय मिलते रहे। आज भी कांग्रेस के दिल्ली हाईकमान में इन्हीं नेताओं का हाथ है।

पार्टी में उन नेताओं की कमी है जो जमीनी स्तर पर वोट ला सकें।

चूंकि ये नेता पार्टी में आने वाले या पार्टी के अंदर से उभर रहे प्रतिभाओं को परखने, उन्हें जिम्मेदारी सौपने का काम करते है जिसमें अक्सर यही देखा जाता है कि किसी का आना पार्टी में स्थापित नेता के वजूद के लिए कही चुनौती न बन जाये। यही कारण है कि पार्टी में उन नेताओं की कमी है जो जमीनी स्तर पर वोट ला सकें।

जमीनी स्तर के नेता ज्यादातर शूद्र/दलित/आदिवासी समुदायों से आते हैं। उदाहरण के लिए, वाई.एस. राजशेखर रेड्डी और विलासराव देशमुख एक कृषि पृष्ठभूमि से जननेता के रूप में उभरे हैं लेकिन कांग्रेस ने इन मजबूत राज्य-स्तरीय नेताओं को दिल्ली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की अनुमति नहीं दी और उन्हें राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के रूप में उभरने से रोक दिया गया।

आजकल, विभिन्न राज्यों में ग्रामीण पृष्ठभूमि के सुशिक्षित नेता उभर रहे हैं; यूपी में अखिलेश यादव और बिहार में तेजस्वी यादव चतुराई से बीजेपी से लड़ रहे हैं। अगर कांग्रेस ऐसे नेताओं को अपने ही खेमे से उभरने देती, तो शायद एक परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित राजनीति के लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे को दूर किया जा सकता है।

पार्टी की आलाकमान की मंडली साजिश ही रचती रहती है

लेकिन पार्टी के आलाकमान के इर्द-गिर्द की मंडली ज्यादातर वास्तविक बदलाव करने के बजाय ज्यादातर मनगढ़ंत साजिश ही रचते रहते है ताकि पार्टी में उनके वजूद को किसी नए नेताओं के द्वारा चुनौती न मिल सके। आज की कांग्रेस इस गंभीर समस्या से जूझ रही है। भाजपा अब निश्चित रूप से सबसे शक्तिशाली राष्ट्रीय पार्टी है और कांग्रेस का दबदबा देश भर में बिखरे हुए गिने-चुने इलाकों तक सिमट कर रह गया है।

गौरतलब बात यह है कि कांग्रेस ने पी.ए. संगमा जैसे आदिवासी नेता को तो पार्टी से निकाल दिया लेकिन आज तक किसी दलित नेता को किसी भी राज्य में उभरा नहीं है। अब जाक चरणजीत सिंह चन्नी के जरिये दलित नेतृत्व उभारने की एक छोटी कोशिश हुई है।

आज कांग्रेस के पास युवा दलित नेता के रूप में केवल चरणदास चन्नी हैं

आज कांग्रेस के पास युवा दलित नेता के रूप में केवल चरणदास चन्नी का ही उदाहरण है जिसे हाल ही में पंजाब के मुख्यमंत्री के पद पर पदोन्नत किया गया है। चन्नी एक शिक्षित नेता हैं। जिन्होंने पंजाब के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की है; कानून की डिग्री है, एमबीए है और वर्तमान में पीएचडी कर रहे है। अमरिंदर सिंह की छवि एक सामंती राजा की बनी है और नवजोत सिंह सिद्धू की छवि जननेता से अधिक एक अभिमानी क्रिकेट की। अमरेंद्र सिंह और नवजोत सिंह के आपसी टकराव के बीच चन्नी पर विश्वास को राहुल गांधी के राजनीतिक जोखिम के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन चन्नी खुद को एक ऐसे नेता के रूप में प्रमाणित करने का प्रयास कर रहे हैं जो भाजपा औऱ नरेंद्र मोदी के हरेक चालाकियों का काट निकाल सके।

मोदी सरकार ने पंजाब में 5 जनवरी के सुरक्षा मुद्दे का गंभीरता से राजनीतिकरण करने की कोशिश की थी, राज्य सरकार के अधिकारियों से या यूं कहें कि सीधे मुख्यमंत्री चन्नी पर हमला करते हुए कहा, “अपने सीएम को धन्यवाद कहना, मैं भटिंडा हवाई अड्डे तक जिंदा लौट आया”

निस्संदेह,यह बहुत ही गम्भीर राजनीति है जहां युवा दलित मुख्यमंत्री को बदनाम करने और उनके राजनीतिक जीवन को समाप्त करने के इरादे से प्रधानमंत्री अपनी जान से हत्या करने जैसे सम्वेदनाओं को भुनाना चाहते हैं।

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