कहानी सोनिया 'कृषा' की

कहानी सोनिया ‘कृषा’ की

पढ़ी-लिखी और आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर महिलाऐं सामाजिक चुनौतियों से लड़ने में सक्षम होती हैं। भले ही उनका जीवन पुरुषों की तरह सहज नहीं हो लेकिन वो कई रूढ़ियों को लांघने में सक्षम होती हैं। राजस्थान की बेटी सोनिया ‘कृषा’ एक चर्चित साहित्यकार हैं।  इन्होंने फिल्म के लिए भी गाने लिखी हैं। साथ ही स्क्रीन राइटर एसोसिएशन  (SWA) की मेंबर भी है। इनकी रचनाओं से यह समझा जा सकता है कि जैसे जैसे हमारा समाज बदल रहा है, आधुनिक हो रहा है, महिलाऐं सक्षम भी हो रही हैं और उनकी समस्याएं भी अपना स्वरूप बदल रही हैं।शैक्षणिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता के बावजूद महिलाओं के हिस्से का संघर्ष अभी बाकी है

क्यूँ आखिर हर महिला आत्मनिर्भर होना चाहती है?

सोनिया ‘कृषा’ का मानना है कि आत्मनिर्भरता हरेक हाल में आपको(चाहे आप स्त्री हैं या पुरुष) समानता के अवसर देती है,आप इससे स्त्रियों को अलग नहीं रख सकते। यदि ऐसा ना होता तो क्यूँ आखिर हर महिला आत्मनिर्भर होना चाहती है, इससे स्त्रियों की स्थिति हर क्षेत्र में मजबूत हुई है, चाहे सामाजिक स्तर पर देखें या फिर पारिवारिक।हम स्वीकार करें ना करें, मगर ये सच है कि इसी के चलते आज घरेलू महिला की स्थिति कामकाजी महिलाओं की अपेक्षा कमजोर हुई है। जो कि खतरनाक संकेत हैं।

अपनेआप को बेहतर स्थिति में लाना अनिवार्य लगने लगा है।

पारिवारिक ढाँचा कमज़ोर होता जा रहा है, मगर इसका दोषी हमारा समाज है जो कि महिलाओं को हमेशा से हर पायदान पर कम आँकता आया है। कामकाजी महिलाओं की बेहतर स्थिति को देखते हुए आज हर महिला को घर संभालने से बेहतर घर से बाहर निकलकर अपनेआप को बेहतर स्थिति में लाना अनिवार्य लगने लगा है। यदि घरेलू महिला को सम्मान और समान अधिकार मिलते आए होते तो अपनी स्थिति सुधारने का यह पैमाना कभी नहीं बनता।आप देखेंगे तो पाएंगे कि ऐसा होने से आगे चलकर हमारी परिवार व्यवस्था पूरी तरह चकनाचूर हो जाएगी। यह भयावह है,मगर समाज की सोच के चलते महिलाओं की बेहतर स्थिति के लिए और कोई विकल्प भी नहीं।

कुछ पैमानों पर महिलाओं को अधिक मुश्किलों का सामना भी करना पड़ता है आत्मनिर्भर होने के चलते,जैसे कि दोहरी ज़िम्मेदारी,कार्यस्थल पर शारीरक शोषण और घर व नौकरी के बीच सामंजस्य बैठाना। लेकिन आत्मनिर्भरता के बदले में मिलने वाले फायदों को देखते हुए ये सब बातें गौण हैं, इसलिए आत्मनिर्भर होना किसी भी तरह नुकसानदेह नहीं। और तो और हमारे देश में जहाँ महिलाओं का पति की सम्पत्ति में कानूनी तौर पर ज्यादा कोई अधिकार ही नहीं, मात-पिता की सम्पत्ति में अधिकार केवल कागजों में है,ऐसे में उसकी आर्थिक निर्भरता उसे शोषण सहने पर मजबूर करती है, केवल और केवल आत्मनिर्भर होना ही एकमात्र उपाय है अपनी स्थिति मजबूत बनाने का, जो कि बन भी रही है।

शिक्षा से पुरुषों और स्त्रियों के बीच का अंतर मिट रहा है।

सोनिया को इस बात का संतोष है कि शिक्षा से पुरुषों और स्त्रियों के बीच का अंतर मिट रहा है। अभी तक समाज में  जो अंतर मिटा है वो शिक्षा से ही मिटा है। अशिक्षित महिलाओं की स्थिति आज भी दयनीय है, शिक्षा ने ही आत्मनिर्भरता दी है,अपने अधिकारों का उपयोग करना सिखाया है, अपनी आवाज़ उठाना सिखाया है।इससे ज्यादा क्या बदलाव चाहेंगे आप? वैसे भी एक दिन में परिवर्तन नहीं आता, समाज को बदलने में वक्त लगता है, और ये अंतर तो प्रकृति ने ही करके भेजा है।मेरे मुताबिक अंतर खत्म होना बात ही गलत है,कुछ चीज़ों में सिर्फ नारीवाद का झंडा उठाकर हम समाज को गलत दिशा में ले जा रहे हैं।जैसे कि नशा और गालियां देना, दोनों बुराई हैं जो कि पुरुषों के लिए भी उचित नहीं, हम उसको खत्म नहीं कर पा रहे,लेकिन महिलाओं में इस पायदान पर उतरकर बराबरी करना क्या उचित है! 

साहित्यकार सोनिया ‘कृषा’ की यह कविता औरतों की अस्मिता की सच्ची तस्वीर उरेकती है।

“वो सिगरेट के कश फूंकती औरतें,

गालियाँ बकती औरतें,

बराबरी तो कर सकतीं हैं

मगर प्रेम नहीं कर सकतीं,

फिर एक बात बताओ ज़रा तुम्हे सिगरेट-शराब पीने,

गाली-गलौज करने जैसी चीज़ों में बराबरी करनी क्यूँ है भला,

तुम्हे संस्कार में एक दर्ज़े ऊपर बनाया है परमात्मा ने पुरुष से,

तो भला एक पायदान नीचे क्यूँ उतरना है,

वो उन नाजुक दिनों पर सरेआम चर्चा कर,खुदको बेचारी बताने वाली औरतें,

वो जननी होने को एहसान तो मान सकती हैं समाज पर,

पुरुष पर,मगर माँ होना सौभाग्य नहीं समझ सकतीं,

वो सैक्स के मापदंड पुरुषों जैसे खुले चाहने वाली औरतें,

वो दैहिक  मिलन तो कर सकती हैं,

मगर रूहानी इश्क़ नहीं कर सकतीं।”

प्रकृति ने एक दर्जे ऊपर बनाया है औरत को

सोनिया का मानना है कि प्रकृति ने एक दर्जे ऊपर बनाया है औरत को, उन्हें सृजन की क्षमता देकर। आखिर अपने उसी गुण को क्यूँ खोना? आजकल गाली-गलौज और शराब पीकर हुल्लड़ करने को भी पुरुषों की बराबरी के तौर पर देखा जा रहा है, मेरे ख्याल से ऐसी बराबरी हमें पतन की ओर ही लेकर जाएगी। आप अंतर मिटाकर महिलाओं को घरेलू ज़िम्मेदारियों से मुक्त नहीं कर सकते, सबके अपने-अपने कार्यक्षेत्र हैं, जो कि परिवार व्यवस्था को चलाने के लिए ज़रूरी है, आप उन्हें समानता के नाम पर पूरी तरह ध्वस्त नहीं कर सकते।

कुछ जिम्मेदारियां ऐसी भी हैं जो कि सिर्फ पुरुष निभाते हैं, अपने घर की महिलाओं को सुरक्षित और सुविधाजनक परिस्थितियों में रखने के लिए, इसलिए अंतर मिटाना शब्द सही नहीं है, क्योंकि हम शारीरिक संरचना परिवर्तित नहीं कर सकते, इसलिए बहुत कुछ ऐसा है जो कभी बदलना नहीं चाहिए, इसमें स्त्री और पुरुष दोनों की भलाई है। जो अंतर मिटना चाहिए वो है महिलाओं को कमतर आँकना,उनकी क्षमताओं पर प्रश्न उठाना और उन्हें उचित सम्मान ना देना। और ये सब सिर्फ और सिर्फ शिक्षा से ही संभव होगा, पुरुषों की सोच भी शिक्षा से ही बदलेगी और महिलाओं की स्थिति भी।

सोनिया ‘कृषा’ कहती हैं कि यदि हम हरेक इंसान को सिर्फ और सिर्फ इंसान समझकर  देखेंगे तो समाज अपने आप बदल जाएगा। इस एक बदलाव से महिला-पुरुष,अगडा-पिछडा,ऊँच-नीच सब समस्याओं का हल हो जाएगा। सही मायनों में ये पुरुष बनाम महिला नहीं बल्कि ताकतवर बनाम कमज़ोर है,जो कमज़ोर है वो जो कोई हो शोषित होता रहा है और होता रहेगा।

इंसान को इंसान की नज़र से देखना ही हल है

इंसान को इंसान की नज़र से देखना ही हल है,वर्ना ताकतवर कमज़ोर को खाता आया है और खाता रहेगा, जजमेंटल होना खासतौर पर हमारे भारतीयों की सबसे बड़ी बुराई है, हर कोई दूसरे के लिए जज बना बैठा है, कुछ मापदंड सैट कर दिये गए हैं,उनसे अलग जो कुछ भी है वो गलत है,इसके चलते आडम्बर और बुराइयों को पनपने का अवसर ही मिलता आया है।हमारे यहाँ संस्कृति के नाम पर जितना मानसिक और शारीरिक शोषण होता है उतना कहीं नहीं होता।

छुपकर जितने गलत काम होते हैं खुलकर उतना ही लोगों का जीना मुहाल होता है,स्त्री-पुरूष के सहमति से संबंध अमान्य हैं और घरों तक में अपने ही रिश्तों के हाथों महिलाएं सुरक्षित नहीं।जाति-धर्म के नाम पर शहर के शहर फूंक दिये जाते हैं मगर बलात्कार की घटनाओं पर कोई आन्दोलन नहीं हुआ आज तक,जबकि बहन-बेटी हर घर में है,फिर भी ये किसीका ज़ाती मुद्दा नहीं, इस पर किसीका खून नहीं खौलता, कोई एकजुट नहीं होता, समाज के किस-किस रवैये पर बात करेंगे आखिर, समस्याएं सोच में हैं और सोच बदलने में पीढियां लग जाती हैं।बरसों की मानसिकता बदलने में वक्त लगेगा।महिलाओं की भागीदारी भी इसमें कम नहीं, स्त्रियों की खराब स्थिति के लिए पुरुषों से ज्यादा स्त्रियाँ ही जिम्मेदार हैं।

सामाजिक मान्यताओं में बदलाव की गति बहुत धीमी है।

विज्ञान और तकनीक में विकास की अपेक्षा सामाजिक मान्यताओं में बदलाव की गति बहुत धीमी है।  सोनिया इसके पीछे  ‘मानसिकता’ को जिम्मेदार मानती हैं। उनका मानना है कि विज्ञान और तकनीक के विकास के लिए प्रयोगशालाएं बना सकते हैं,साधनों की उपलब्धता उसकी गति चौगुनी तेज कर सकती है, मगर बरसों से जमी सोच और जड तक पैरी हुई मानसिकता को आप कौनसे संसाधनों से बदलकर रख देंगे बताइए,ये शिक्षा ही वो शोधशालाएं हैं, ज्ञान और संस्कार ही एकमात्र संसाधन हैं, लेकिन इनकी गति बहुत धीमी होती है, सही मायने में मनुष्य को मनुष्य बनने में अभी एक लम्बा वक्त लगेगा।अक्सर यह देखा जाता है कि आत्मनिर्भर बनने के बाद भी कोई-न्-कोई सामाजिक मान्यताएं संघर्ष के रूप में उपस्थित रहती ही हैं। 

आत्मनिर्भरता संघर्ष को पूरी तरह से खत्म नहीं कर पाती।

सोनिया ‘कृषा’ बताती हैं कि आत्मनिर्भरता संघर्ष को पूरी तरह से खत्म नहीं कर पाती। लेकिन यह जीवन में सुलभता और सम्मान लाती है।आजकल आत्मनिर्भर महिलाओं के प्रति समाज का रवैया बिल्कुल बदल चुका है,उन्हें ऐसी महिलाओं को सम्मान देना ही पडता है। ये और बात है कि कुछ लोग इसको पचा नहीं पाते हैं और कामकाजी महिलाओं के चरित्र पर उंगली उठाना और लांछन लगाना एक आम बात है,एक औरत को आगे बढता देख बहुत सी आँखों में मिर्च लगा करती है, और उनको रोकने का सबसे आसान तरीका उनके चरित्र पर सवाल खडे कर देने से बेहतर और कोई नहीं, कामकाजी महिलाओं को बाहर के पुरुषों से मिलना-जुलना भी पडता है जो कि औरत की खिलाफत करवाने को काफी है।असल में पुरुषों को अपना दबदबा कायम रखने के लिए औरतों का ज्यादा आगे बढना खटकता है,इसमें पढे-लिखे पुरुष भी पीछे नहीं।

 गौरतलब बात यह है कि सोनिया जब महिला अपराधों के खिलाफ कलम चलाती हूँ तो बाहर से ही नहीं बल्कि घर-परिवार से भी विरोध और अभद्र बातें सुननी पडती हैं, ये तब है जबकि मैं पुरुषों और महिलाओं को लेकर कट्टर बिल्कुल नहीं हूँ, जहाँ पुरुष शोषित है वहाँ भी मेरी लेखनी उतनी ही बुलंद है जितनी महिलाओं के लिए, उसके बावजूद आप महिलाओं की दयनीय स्थिति पर बोलते हैं तो निश्चित रूप से आप जलील किए ही जाएंगे। मगर इन्हीं बातों को नज़र अंदाज़ करते हुए सच के साथ खडा होना पडेगा, जहाँ गलत हो रहा है वहाँ अपनी आवाज़ उठानी पड़ेगी, और मैं सच की आवाज़ बनती रह सकूँ यही मेरी ख्वाहिश है।

सोनिया ‘कृषा’ की उपलब्धियाँ-

अदम्य अचीवर्स अवार्ड(2019)

कावेरी फिल्म में ‘ माँ ‘ गीत,

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन व प्रकाशित रचनाएँ,

प्रकाशित पुस्तकें- 

‘लफ़्ज़ दर लफ़्ज़ मैं’

‘अमृत कलश’

‘मुकद्दस ख्वाब’

‘बेलौस रूह’

‘तृप्ति के फूल’

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