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सियासत पर शायरी

सियासत पर शायरी
सियासत पर शायरी

बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है
मुनव्वर राणा 

कल सियासत में भी मोहब्बत थी
अब मोहब्बत में भी सियासत है
ख़्वाजा साजिद

एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है
तुमने देखा नहीं आँखों का समुंद्र होना
मुनव्वर राना
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कांटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ
शकील बद एवनी
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ये सियासत भी अजब खेल है भोले पंछी
यहां सय्याद भी तुम हो तोतहे दाम भी तुम
वसी शाह

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा ना हों
बशीर बदर
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हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना
निदा फ़ाज़ली
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नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है
साबिर दत्त

सियासत पर शायरी


कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है
कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते
इर्तिज़ी निशात
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देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें
ढूँडोगे तो इस शहर में क़ातिल ना मिलेगा
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
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धुआँ जो कुछ घरों से उठ रहा है
ना पूरे शहर पर छाए तो कहना
जावेद अख़तर
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इशक़ में भी सियासतें निकलीं
क़ुर्बतों में भी फ़ासिला निकला
रसा चुग़्ताई
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समझने ही नहीं देती सियासत हमको सच्चाई
कभी चेहरा नहीं मिलता कभी दर्पण नहीं मिलता
नामालूम

मुझसे क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए
कभी सोने कभी चांदी के क़लम आते हैं
बशीर बदर
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उनसे उम्मीद ना रख हैं ये सियासत वाले
ये किसी से भी मुहब्बत नहीं करने वाले
नादिम नदीम
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ये सच्च है रंग बदलता था वो हर इक लम्हा
मगर वही तो बहुत कामयाब चेहरा था
अंबर बहराइची
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वो ताज़ा-दम हैं नए शोबदे दिखाते हुए
अवाम थकने लगे तालियाँ बजाते हुए
अज़हर इनायती

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