Shishir Somvanshi

शिशिर सोमवंशी की कविता

शिशिर सोमवंशी की कविता

बीच में अपने एक जंगल था
जिसको पार मुझे करना था
एक नदी भी थी क़िस्मत की
जिस पर पुल मुझको रचना था
दिन छोटे थे रात बड़ी थी
क्या बतलाऊँ कठिन घड़ी थी
फिर भी मैं तुम तक पहुँचा था
जिस दिन हम तुम जुदा हुए थे।


जिस दिन हम तुम जुदा हुए थे
मैंने पुल सब तोड़ दिए थे
बाँध बनाता हूँ नदियों पर
दिन भर धूप तपाये तन को
रात चाँदनी में जलता हूँ
आस रहित सूनी आँखों से
पेड़ों पत्तों को पढ़ता हूँ
अब तक जंगल से लड़ता हूँ ।

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