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शिद्दत पर शायरी

शिद्दत पर शायरी
शिद्दत पर शायरी

तुम्हारी याद की शिद्दत में बहने वाला अशक
ज़मीं में बो दिया जाये तो आँख उग आए
हारिस बिलाल
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इक दूसरे से ख़ौफ़ की शिद्दत थी इस क़दर
कल रात अपने आपसे मैं ख़ुद लिपट गया
फ़र्हत अब्बास

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शिद्दते शौक़ में कुछ इतना उसे याद किया
आईना तोड़ के तस्वीर निकल आई है
मंज़ूर हाश्मी

शिद्दत-ए-इंतिज़ार काम आई
उनकी तहरीर मेरे नाम आई
शुजाअ ख़ावर
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कितनी शिद्दत से तुझे चाहा था
कभी कुछ और नहीं सोचा था
महमूद शाम
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तेरे लहजे में ये जो शिद्दत है
ये कोई इन-कही शिकायत है
तारिक़ उसमानी
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बहुत शिद्दत से जो क़ायम हुआ था
वो रिश्ता हम में शायद झूट का था
शमामा उफ़ुक़

शिद्दत पर शायरी


तीरगी की शिद्दत को सुबह का सितारा लिख
फैलने ही वाला है हर तरफ़ उजाला लिख
जावेद अख़तर बेदी
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मेरे ख़ुलूस की शिद्दत से कोई डर भी गया
वो पास आ तो रहा था मगर ठहर भी गया
शकेब जलाली
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हर एक ज़ख़म की शिद्दत को कम किया जाता
नमक से काम ना मरहम का गर लिया जाता
नबील अहमद नबील
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रस्ता भी कठिन धूप में शिद्दत भी बहुत थी
साये से मगर उस को मुहब्बत भी बहुत थी
परवीन शाकिर

इतनी शिद्दत से गले मुझको लगाया हुआ है
ऐसा लगता है कि वक़्त आख़िरी आया हुआ है
ज़िया ज़मीर
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यूं दर्द की शिद्दत से पुकारी मेरी आँखें
ख़ाबों के बिखर जाने से हारी मेरी आँखें
अस्मा-ए-हा दिया
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साक़ी मरे ख़ुलूस की शिद्दत को देखना
फिर आ गया हूँ गर्दिश-ए-दौरां को टाल कर
अबद अलहमेद अदम

शिद्दत पर शायरी


वस्ल ने तो मुझे शिद्दत की तपिश में रखा
हिजर था जिसने मुझे साया-ए-दीवार दिया
एहतिमाम सादिक़
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कुछ दर्द की शिद्दत है कुछ पास-ए-मोहब्बत है
हम आह तो करते हैं फ़र्याद नहीं करते
फ़ना निज़ामी कानपुरी
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इक दिन दुख की शिद्दत कम पड़ जाती है
कैसी भी हो वहशत कम पड़ जाती है
काशिफ़ हुसैन ग़ाइर
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रास आती ही नहीं जब प्यार की शिद्दत मुझे
इक कमी अपनी मुहब्बत में कहीं रखूँगा मैं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
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अपने एहसास की शिद्दत को बुझाने के लिए
मैं नई तर्ज़ के ख़ुश फ़िक्र रिसाले माँगूँ
अकमल इमाम

ग़ज़ल में जब तलक एहसास की शिद्दत ना हो शामिल
फ़क़त अलफ़ाज़ की कारीगरी महसूस होती है
संदीप गुप्ते

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