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शार्क टैंक इंडिया: स्टार्टअप का रूमानी शो

शार्क टैंक इंडिया
शार्क टैंक इंडिया

इन दिनों मैं अपने परिवार के साथ सोनी लिव के शो ‘शार्क टैंक इंडिया’ के एपिसोड लगातार इस तरह देख रहा हूं , जिसे आजकल के बच्चे बिंज वाचिंग कहते हैं । शो दिलचस्प है ! स्टार्टअप के नए आइडियाज , लाखों करोड़ों रुपयों का तुरत फुरत लेनदेन, किसी जादुई सपने का सा रोमांच है, इस शो में ! स्टार्टअप इन दिनों ‘इन’ है।डेमोग्राफिक डिविडेंड को अधपढ़े , अकुशल बेरोजगारों की भीड़ में गंवाते भारत के हाथ जैसे अचानक अलादीन का चिराग लग गया है- स्टार्ट अप ! 90 के दशक में जैसे शेयर मार्केट , डिविडेंड डिबेंचर और शार्ट सेल जैसे शब्द अचानक मध्यमवर्गीय परिवारों की बोलचाल में आ गए थे , वैसे ही यह शो इक्विटी ,ग्रॉस प्रॉफिट , कैपिटल ,कस्टमर एक्विजिशन और इनोवेशन जैसे शब्दों को हमारे ड्राइंग रूम में ले आया है ,जिसे शाम की चाय के साथ वापरा और बरता जा सकता है ।

नाग नागिन सास बहू और जहरीली सियासी बहसों के मुकाबले यह बेहतर है , पर इसमें कुछ खतरे हैं ।व्यापार एक लंबी कठिन और उबाऊ प्रक्रिया है और स्टार्टअप इसका रूमानी संस्करण। जवानी चीजों को रोमांटिसाइज करने के लिए अभिशप्त है । नौजवान हमेशा सोचता है दुनिया रातोंरात बदल जाएगी । हमने क्रांति को रोमांटिसाइज किया और सोचा नारे लगाने भर से अमीरी गरीबी खत्म हो जाएगी। फिर हमने फिल्में देखीं और प्रेम को रोमांटिसाइज कर दिया । सोचा कोई है , जो सिर्फ हमारे लिए बना है , बस उसे खोजना बाकी है ।

जाहिर है असल जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं था । स्टार्टअप और इस तरह के शोज़ बिजनेस को रोमांटिसाइज कर रहे हैं । नौजवान मानने लगे हैं कि उन्हें बस एक आइडिया चाहिए । इधर आइडिया मिला और उधर करोड़ों रुपए का इन्वेस्टमेंट हो जाएगा । इस सपने में आइडिया ‘ओवररेटेड’ है । बिजनेस की असल दुनिया में आइडिया या आविष्कार बस एक शुरुआत है । बिजनेस की इमारत ईंट दर ईंट खड़ी होती है , जिसमें प्रोडक्शन , मार्केटिंग , एचआर , अकाउंट्स , इंडस्ट्रियल रिलेशन जैसे मैनेजमेंट के तमाम विषय आवश्यक होते हैं । यदि आईडिया लगाने वाला हमारा नौजवान वैज्ञानिक इन विषयों पर अधिकार नहीं रखता या उस तरह की टीम बनाने का हुनर नहीं जानता तो अच्छे से अच्छा आईडिया भी टेक ऑफ़ करते ही क्रैश हो जाएगा ।

दुर्भाग्य से इन उत्साही नौजवानों में से ज्यादातर के पास इन विषयों का कोई ज्ञान या अनुभव नहीं होता। और उनकी जिद है बगैर इन सब का अनुभव लिए वे सीधे ही इंटरपन्योर बन जाएं । कई स्टार्टअप की बर्बादी के पीछे यही वजह होती है।बिजनेस की असल दुनिया बिल्कुल भी ग्लैमरस नहीं है मगर हम तक सिर्फ सफलता की कहानियां पहुंचती हैं ।ओला , ओयो , लेंसकार्ट या शादी डॉट कॉम जैसे आइडियाज ने जरूर आसमान छुआ पर इनके साथ इन जैसे हजारों लोगों ने कोशिश की थी , जो बाजार की तेज हवाओं में अपने नाजुक पंख तुड़वा बैठे और हमेशा के लिए उड़ने का साहस खो बैठे ।

स्टार्टअप को रोमांटिसाइज करने के खतरों की सूची में इन शहीदों की कहानियों का भी शुमार होना चाहिए । कैरियर के शुरुआती दिनों में कोई बड़ी असफलता इतने बड़े घाव देती है कि सारा जीवन लोग उससे उबर नहीं पाते । मेरा व्यक्तिगत मत है इस खतरे के बजाय छोटी सफलता , असफलता अधिक बेहतर है ।एक और समस्या है । स्टार्टअप का क्रेज़ इस कदर है कि हर दूसरा चौथा नौजवान जब ग्रेजुएशन के बाद कुछ नहीं कर रहा होता तो पूछने पर कहता है मैं स्टार्टअप के लिए आईडिया तलाश रहा हूं । यह ठीक वैसा ही है जैसे पहले लोग बेरोजगारी छुपाने के लिए – आईएएस की तैयारी कर रहा हूं ..” जैसे जवाब देते थे ।

पिछले दिनों मेरे एक मित्र ने अपने बेटे को मेरे यहां सलाह के लिए भेजा। उसने कोई अगड़म बगड़म आइडिया पर बना प्रेजेंटेशन मुझे अपने लेपटॉप पर दिखाया । थोड़ी सी बातचीत से मैं समझ गया कि उसे उस इंडस्ट्री के बारे में कुछ भी पता नहीं था। उसने घर बैठे ही एक ख्याली पुलाव पकाया था जिसके सहारे वह अपने परिवार को पिछले दो सालों से यह विश्वास दिलाने में कामयाब रहा था कि वह कुछ महत्वपूर्ण कर रहा है। इस तरह के कामों को मनोवैज्ञानिक एम जे डिमार्को एक्शन फेकिंग कहते हैं।

नए विचारों का स्वागत किया जाना चाहिए पर स्टार्टअप कैरियर बनाने का अकेला तरीका नहीं है । व्यापार का परंपरागत तरीका दुकान , फैक्ट्री या नौकरी करके भी लोग अपना कैरियर बनाते हैं ।व्यापार गंभीर विषय है , अपरिपक्व दिमाग में इसका इतना ग्लैमर मत भर दीजिए कि असल दुनिया से उनका नाता टूट जाए । नौजवानों को व्यापार की बेदर्द बेरहम दुनिया में कुछ दिन घिसने दीजिए । छोटी-मोटी नौकरी या अपना धंधा करने दीजिए । इस आग में पकने बाद ही वे इतने मजबूत होंगे कि स्टार्टअप के रूमानी आइडिये का बोझ उठा सकें ।

लेखक: संजय वर्मा

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