संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक

संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक

खेलने और स्कूल में पढ़ने की उम्र से ही घर की जिम्मेदारी का बोध होना व्यक्तित्व को ठोस बनाता है। छत्तीसगढ़ की बेटी दीपा दास इस बात की जीता जागता प्रमाण है। उनकी जिंदगी संघर्ष और आत्मनिर्भरता के समिश्रण से बनी प्रतीत होती है।

डॉ. दीपा दास के पिता आधुनिक विचारों वाले थे जो कि देश की प्रतिष्ठित कम्पनी गैमन इंडिया में काम करते थे। उन्होंने बेटियों की परवरिश को सामाजिक बंदिशों से अछूता रखा। बेटियों को बचपन से ही खुले आकाश में उड़ने दिया। डॉ. दीपा दास अपने पिता के साथ बहुत ही कम समय में कई देशों की यात्रा कर लीं। इसके परिमाण स्वरूप के जीवन के क्षितिज का व्यापक विस्तार हो पाया।

छोटी उम्र मैं ही घर की जिम्मेदारी सम्भालनी पड़ी

पिता को नौकरी के कारण घर से दूर रहने तथा दो बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी होने के कारण इन्होंने स्कूल की उम्र में ही घर की जिम्मेदारी सम्भालनी शुरू कर दी। विडंबना यह हुई कि इनके भाई की असामयिक मौत हो गयी। इस स्थिति में ये अपने मां-बाप और छोटी बहन के लिए स्तम्भ बन कर उभरी। मां- बाप की सेवा निष्ठावान सेवा कीं। उनके जीवन में बेटे खोने के गम की भरपाई करने में कोई कसर नहीं छोड़ीं। दीपा दास ने अपनी छोटी बहन के साथ मिलकर माता और पिता के अंतिम संस्कार भी कीं। इन्होंने बेटे के हर कर्तव्यों को बखूबी निभायी है।

डॉ दीपा दास ने शैक्षिक जगत की अनेक उपलब्धियां हासिल की

मुश्किल वक्त में भी मेहनत कर अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने HRM में MBA किया। जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था उस समय इनकी नौकरी राज्य सेवा आयोग के तरफ से जिला शिक्षा मिशन के लिए सुनिश्चित हुआ। फिर इन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। शिक्षा जगत में एक से बढ़ कर एक उपलब्धिया इनके खाते में आ गई। इन्होंने कई स्कूल्स खोलीं, लड़कियों की शिक्षा के लिए उल्लेखनीय काम कीं।

जब मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ राज्य बना तब इन्होंने यहां की सरकारी शिक्षा की विभागीय रूपरेखा उकेरीं। आज भी इनकी योजनाओं से राज्य के कई जिले लाभान्वित हो रहे हैं। आलम यह रहा कि वर्ल्ड बैंक से लेकर कई विदेशी शैक्षिक संस्थानों में भी सहभागिता दे चुकी हैं। Arizona State University,USA से USIAD फेलोशिप किया। हार्वड यूनिवर्सिटी के साथ काम किया, रिसर्च पेपर प्रेजेंट किया। IIM और IIT के विशेषज्ञों के साथ छत्तीसगढ़ की शिक्षा के विकास की पहल की।

डॉ. दीपा दास वास्तव में संघर्ष और सेवा की प्रतिमूर्ति बन चुकी हैं। आज वो अपनी छोटी बहन के साथ रहती हैं। उनकी मेहनत और सेवनिष्ठा हर बेटियों के लिए प्रेरणास्रोत है जो यह सीखती है कि हर विपत्ति से कैसे रास्ता निकाला जाए।

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