सेहत पर शायरी

सेहत पर शायरी

मरीज़-ए-हिज्र को सेहत से अब तो काम नहीं
अगरचे सुबह को ये बच गया तो शाम नहीं
रजब अली बेग सरवर
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बज़ाहिर सेहत अच्छी है जो बीमारी ज़्यादा है
इसी ख़ातिर बुढ़ापे में हवस-कारी ज़्यादा है
ज़फ़र इक़बाल
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शाह के है ग़ुस्ल-ए-सेहत की ख़बर
देखिए कब दिन फिरें हमाम के
मिर्ज़ा ग़ालिब
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अहबाब हाथ उठाएं हमारे ईलाज से
सेहत पज़ीर इशक़ का बीमार हो चुका
इमदाद अली बहर
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हर वक़त फ़िक्र मर्ग ग़रीबाना चाहीए
सेहत का एक पहलू मरीज़ाना चाहीए
मजीद अमजद

मैं तो मरीज़-ए-इश्क़ हूँ मेरी सेहत सेहत नहीं
अच्छा मुझे नहीं किया तुमने बुरा नहीं किया
सोफिया अंजुम ताज
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जिसकी सेहत के लिए आप दुआएं मांगें
ऐसे बीमार को भी मौत कहीं आई है
बिस्मिल इलाहाबादी
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सेहत पर शायरी


इस तरह सोचते रहना नहीं अच्छा शहज़ाद
फ़िक्र सेहत ही ना कर दे कहीं बीमार मुझे
शहज़ाद क़मर
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किस क़दर तेरी दुआओं में असर था ऐ दोस्त
हो गया हूँ मैं सेहत याब दवा से पहले
दानिश फ़राही
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बस इसी वजह से क़ायम है मेरी सेहते इशक़
ये जो मुझको तेरे दीदार की बीमारी है
सालिम सलीम

दवा से फ़ायदा मक़सूद था ही कब कि फ़क़त
दवा के शौक़ में सेहत तबाह की मैंने
जून ईलिया
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हुई मुद्दत, तेरे ज़ुल्फ़ों के दीवाने की सेहत को
बिगड़ जाता है ,शब ज़ंजीर की आवाज़ आती है
रशीद लखनवी
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हर वक़त फ़िक्र मर्ग ग़रीबाना चाहीए
सेहत का एक पहलू मरीज़ाना चाहीए
मजीद अमजद
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बुझ जाये दिल बशर का तो इस को शिफ़ा से किया
किस दर्जा होगी कारगर उस को दवा से किया
अमीर चंद बहार
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सेहत पर शायरी


तेरे मरीज़ को ऐ जां शिफ़ा से किया मतलब
वो ख़ुश है दर्द में उसको दवा से किया मतलब
नज़ीर अकबराबादी

तुम शिफ़ा ढूंडते हो दुनिया में
और वो ख़ाक-ए-शिफ़ा की क़ैद में है
इमरान राहिब
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अजब नहीं है मुआलिज शिफ़ा से मर जाएं
मरीज़ ज़हर समझ कर दवा से मर जाएं
राकिब मुख़तार
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बस वो इक सरसरी नज़र डाले
और बीमार को शिफ़ा लग जाये
वसीम ताश्शुफ़
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उनको देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक
लोग कहते हैं के बीमार का हाल अच्छा है
मिर्ज़ा ग़ालिब
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था आग ही गर मेरा मुक़द्दर
क्यों ख़ाक में फिर शिफ़ा रखी थी
परवीन शाकिर

शिफ़ा भी देता है ये मोजिज़ा मुहब्बत का
किसी मरीज़ का ईमान तेरे जैसा हो
नैना आदिल
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सेहत पर शायरी


तबीबों की सारी है अपनी कहानी
वफ़ा बेचते हैं शिफ़ा बेचते हैं
मर्यम नाज़
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दर्द-ए-दिल की दवा नहीं मालूम
अब उम्मीद-ए-शफ़ा नहीं मालूम
नादिर शाहजहाँ पूरी
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मकतूब में लिखा है मुझे अब शिफ़ा मिले
बीमार को अता हो कभी एक मस के बस
अहमद निसार
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शिफ़ा अपनी तक़दीर ही में ना थी
कि मक़दूर तक तो दवा कर चले
मीर तक़ी मीर

दिन ने इतना जो मरीज़ाना बना रखा है
रात को हमने शिफा-ख़ाना बना रखा है
फ़र्हत एहसास
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ख़ूने सादात ने मिट्टी को फ़ज़ीलत बख़शी
ख़ाक में भी मेरे मौला ने शिफ़ा रखी है
हसीब उल-हसन
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जब राख से उट्ठेगा कभी इशक़ का शोला
फिर पाएगी ये ख़ाक-ए-शिफ़ा और तरह की
बुशरा एजाज़
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किसी के दस्त-ए-शिफ़ा कैसे मेरे काम आएं
मेरे तबीब अगर तुम बचा सके ना मुझे
बशीर दादा
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कि हर बीमार इन आँखों से दवा पाए
शिफा-ख़ाना ये ख़ैराती नहीं है
फ़र्हत एहसास

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