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सतयुग,त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग क्या है? | युग कितने है

युग कितने है
युग कितने है

सनातन धर्म में धर्म को बहुत ही बारीकी से बताया गया है।इस में समय के भागों यानी काल खंड के बारे में बहुत विस्तार से समझाया गया है। इसमें समय की ऐसी गणनाएँ भी बताई गई हैं जिसे वैज्ञानिक आज भी ढूंढ रहे हैं। इसी तरह इस में हमारे बरह्माण्ड के चार कालखंड के बारे में बताया गया है। जो खुद को बार बार दोहराते हैं।ये चार भाग हैं सतयुग , त्रेतायुग ,द्वापरयुग ,कलयुग।

सतयुग

आज हम आपको सतयुग की पूरी जानकारी देने वाले हैं की कैसा हुआ करता था सतयुग। सतयुग का अर्थ होता है सच्चाई का युग यानी वो समय जब सच्चाई ही हर तरह होती है। एक महायुग में चार युग होते हैं और सतयुग सबसे पहला युग होता है।

एक महायुग के अंत में विनाश होता है। उसके बाद दोबारा जीवन का उदय होता है। और तब सबसे पहला युग ही सतयुग होता है। सात युग का कुल समय १७ लाख २८ हज़ार साल का होता है। ये युग होता है तप का ,सच्चाई का। इस युग की सबसे ख़ास बात ये होती है की जीवन की उत्पत्ति के बाद स्वंम देवता मनुष्यों को शिक्षा देते हैं।

इस युग में मनुष्य का मानसिक स्तर उच्च स्तर तक पहुँच जाता है। जिस तरह से आज हम बचपन से शिक्षा ग्रहण करते हैं जीवन और भौतिक ज्ञान की। उस समय शिक्षा तप और मानसिकता की होती है। इस युग में इंसान की आयु दस हज़ार से एक लाख साल तक की होती है। कियोंकि मनुष्य मानसिक ज्ञान को पा लेता है। इस युग में कोई एक दुसरे से झूट नहीं बोल पाता। कियोंकि मानसिक ज्ञान पा लेने के बाद हर मनुष्य का दिमाग़ एक दुसरे से जुड़ जाता है। इस लिए बात करने के लिए बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

एक दुसरे का दिमाग़ पढ़ने वाला मनुष्य झूट बोल ही नहीं सकता। आप भी एक बार आँखें बंद करके सोचिये ऐसा युग जिसमें झूट नहीं हो कैसा होगा। इसी लिए इसे सतयुग कहा जाता है। इस युग में कोई बिमारी नहीं होती कियोंकि मानसिक स्तर को उच्च स्तर तक पहुंचा लेने वाला मनुष्य शरीर के सेल्स की पूरी जानकारी रखते हैं। तो कोई वायरस या डिसीस असर नहीं करता। हम आज जानते हैं जब कोई वायरस या डिसीस हम पर असर करता है तो हम दवाई लेते हैं। लेकिन वह दवाई बिमारी को ख़त्म नहीं करती वह सिर्फ हमारे शरीर की एंटी बॉडीज को एक्टिव कर देती है। जिससे शरीर खुद उस बीमारी से लड़ता है और बिमारी का अंत होता है।

अगर हम अपने शरीर और दिमाग़ पर पूरा कण्ट्रोल कर सकें तो हम हर बिमारी पर पूरी विजय हासिल कर सकते हैं। यही सतयुग का हर मनुष्य कर पाता है। इसे आप मॉर्डर्न साइंटिफिक तरीके से समझिये। इसे आप भी नकार नहीं पाएंगे। हमारा दिमाग़ तीन भागों से काम करता है। Conscious mind, Subconscious mind और Unconscious mind यानी दिमाग़ का वह हिस्सा जिसे हम चेतना कहते हैं। इसका शरीर पर पूरा कण्ट्रोल नहीं होता। सबसे बड़ा काम इस Subconscious mind और Unconscious mind का होता है। दिल की धड़कन चलाना या एंटी बॉडीज को बनाना। आज हम इन हिस्सों सीधे एक्सेस नहीं कर पाते।

हर एक वैज्ञानिक यही कहता है ऐसा सिर्फ मेडिटेशन से ही किया जा सकता है। मेडिटेशन यानी तप। इसे सतयुग के चार स्तंभों का पहला स्तंभ कहा जाता है। धर्म के चार स्तंभ ये हैं। तप,सच्चाई , शुद्धि और दया। इन्हीं स्तंभों की वजह से सतयुग को स्वर्णयुग कहा। जैसे ही युग बदलता है एक एक करके स्तंभ कम होने लगते हैं।

सतयुग में ही भगवान् विष्णु ने चार बार अवतार लिया। इस युग में मानसिक शांति होती है और इसे ही आदर्श युग कहा जाता है। इसी युग में वेदों का ज्ञान हर मनुष्य के पास होता है। हर आम मनुष्य का चरित्र एक देवता के बराबर होता है। लेकिन परिवर्तन समय का वह भाग है जो हमेशा इसे चलाये रखता है। इसी लिए भले ही सतयुग सबसे आदर्श युग होता है लेकिन इसका भी एक दिन अंत होता है। १७ लाख २८ हज़ार साल पूरे करने के बाद जब इसका अंत हुआ तो त्रेता युग प्रारंभ हुआ।

त्रेतायुग

त्रेतायुग को रजतयुग कहा जाता है। यानि silver age इस युग में ज्ञान बटना शुरू जो जाता है। जिस प्रकार सतयुग में वेदों का ज्ञान हर मनुष्य के पास होता है लेकिन वह लिखित अवस्था में नहीं मानसिक अवस्था में होता है। त्रेतायुग में वेदों को भी चार भागों में विभाजित कर दिया जाता है कियोंकि मनुष्यों का मानसिक स्तर ही क्षीण होने लगता है। मानसिक स्तर के सर्वोच्च न रहने के कारण ही शरीर भी विकारों से भरना शुरू हो जाते हैं। और इसका सबसे बड़ा कारण होता है धर्म के चार स्तंभों में से एक स्तंभ का काम हो जाना। यानि तप को इस युग में त्याग दिया जाता है। तप से ही हर मनुष्य की परमात्मा भगवान् से जुडी होती है लेकिन इस युग से तप को जीवन के लिए ज़रूरी नहीं समझा जाता। इसी कारण मनुष्यों में मतभेद होना शुरू हो जाता है। इस युग में विचारों का आदान प्रदान लिखित या बोल कर करना शुरू हो जाता है। फिर भी इस युग को सच्चाई और शुद्धि अपने स्थान पर बनाए रखती है। इसी युग में भगवान् विष्णु के टीम अवतार हुए। वामन अवतार , परशुराम अवतार और श्री राम अवतार। श्री राम को इस युग का आदर्श पुरुष कहा गया। कियोंकि वह धर्म के तीनों स्तम्भों की मर्यादा बनाये हुए थे। यानि शुद्धि सच्चाई और दया।

त्रेतायुग का कुल समय १२ लाख और ९६ हज़ार साल का होता है। श्री राम जी त्रेतायुग के अंत के समय हो अवतरित हुए थे। इस युग में मनुष्य की आयु १० हज़ार साल की होती है। श्री राम भी १० हज़ार साल तक धरती लोक पर रहे। इस युग में तप न होने के कारन ज्ञान श्रोत सिर्फ वेदों में ही रह जाता है। इसी कारन वेदों का ज्ञान रखने वाला ज्ञानी कहलाता है। रावण चारों वेदों का ज्ञाता था लेकिन त्रेता युग के अंतिम छन होने के कारण शुद्धि तक नहीं पहुँच पाया। इस युग से ही इंसानों की आयु काम होना शुरू हो जाती है। कियोंकि मनुष्य तप को नहीं मानता और शारीरिक विकार और बिमारियों से पीड़ित होता है। इससे आयु में कमी आने लगती है।

मानसिक स्तर गिरने के कारन ही भौतिक मोह भी बढ़ने लगता है। इसी युग में राज्यों और राजाओं का निर्माण होना शुरू होता है। इसी युग में मनुष्य भौतिक लाभ की वजह से युद्ध तक करने लगते हैं। फिर भी यह युग जीवन के लिए अच्छा ही कहा जाता है। इसी युग में भौतिक ज्ञान का विस्तार होना शुरू हो जाता है। इसी युग में जीवन के नियम बनना शुरू हो जाते हैं। पुराणों और शास्त्रों का भी निर्माण होता है। कियोंकि ज्ञान को मानसिक स्तर तक आगे नहीं बढ़ाया जा सकता तो इसे लिखित रूप में सुरक्षित कर लिया जाता है। भले ही इस युग में इंसान मानसिक शक्ति क्षीण कर लेता है लेकिन वह नियमों का पालन करता है। धर्म का पालन करता है। इसी कारण श्री राम से लेकर रावण तक वह नियमों का पालन करते थे।

द्वापरयुग

त्रेतायुग के बाद आता है द्वापरयुग जिसमें धर्म के दो स्तम्भ कम हो जाते हैं। एक ऐसा युग जब मनुष्य सन्ति से ज़्यादा भौतिक सुख को अहम समझने लगता है। एक ऐसा युग जब शक्ति को ज्ञान से भी बढ़कर समझा जाने लगता है। इस युग की सही जानकारी शायद आपको पहले पूरी तरह से नहीं मिली होगी।

द्वापरयुग को भौतिक विस्तार के ज्ञान वाला युग कहा जाता है। इस पूरे युग का समय ८ लाख ६४ हज़ार साल का होता है। इस युग में केवल धर्म के दो ही स्तंभ रह जाते हैं। सच्चाई और दया। इस युग की शुआत में ही तप और शुद्धि को त्याग दिया जाता है। तप का ज्ञान किसी के पास नहीं रह जाता। और शुद्धि प्रत्येक मनुष्य के मन से दूर हो जाती है। इस युग को सिर्फ सच्चाई ही बचा कर रखती है। इसका उदहारण है महाभारत का युद्ध। जिसमें मन की शुद्धि न होने के कारण आपसी बैर पैदा हो गए। लेकिन सच्चाई ने ही सबको बांधे रखा। पूरे युद्ध में अस्त्र शस्त्र और ईर्ष्या का भाव रहा। लईकिन किसी ने भी सच्चाई का त्याग नहीं किया। कौरवों और पाण्डवों का युद्ध भी नियमों के तहत हुआ।

इस युग में चारों वेदों का ज्ञान किसी के पास नहीं होता है। इस युग में ज्ञान बहुत कम लोगों के पास रह जाता है। इस लिए ईश्वर के अस्तित्व पर भी सवाल उठना शुरू हो जाता है। इस युग में मानसिक ज्ञान नहीं होता तो भौतिक ज्ञान से ही जीवन यापन शुरू हो जाता है। इसी युग में वर्णों का निर्माण हो जाता है। वर्ण यानि जो व्यक्ति जिस तरह का कार्य करता है उसके पास जो ज्ञान है उससे वर्ण को निर्धारित किया जाता है। इसी शब्द को कलयुग में जाती में बदल दिया गया है। जो कलयुग का अज्ञान है। कार्यों से चार वर्णों का निर्माण हुआ। ब्राह्मण ,क्षत्रिय , विष्णुया और शूद्र।

हर नए जन्मे बच्चे को शूद्र की श्रेणी में रखा जाता था। और जीवन में वह क्या कर पाता था उससे वर्ण निर्धारित होते थे। जैसे विधुर शूद्र के घर जन्म लेकर हस्तिनापुर के मंत्री बने और ब्राह्मण कहलाये। इसी युग में भगवान् विष्णु के दो अवतार हुए। जबकि कई पुराणों के अनुसार इस युग में सिर्फ एक ही अवतार हुआ। इस युग में ज्ञान के क्षीण होने के कारण स्वयं ईश्वर अवतरित होकर ज्ञान देते हैं। जैसे श्री कृष्ण के अवतार में भगवद गीता का ज्ञान दिया था। इस युग में इंसानों की आयु और काम होकर १००० साल की रह जाती है। लेकिन शक्ति के लिए किये युद्धों के लिए यहाँ तक भी कोई कोई ही पहुँच पाता है। इसी युग के अंत के समय से बीमारियां नए नए रूप लेना शुरू कर देती हैं। कियोंकि मनुष्य का शरीर ज्ञान और निरंतरण से दूर होना शुरू हो जाता है।

इस युग में शक्ति और सुख के लिए युद्ध होते हैं। मनुष्य के जीवन का महत्त्व बहुत ही कम हो जाता है। फिर भी इस युग को दया और सच्चाई ही बंधे रखती है। इस युग में साधना का ज्ञान भी अंत आते आते पूरी तरह से लुप्त हो जाता है। इस युग का अंत भी तब हुआ जब श्री कृष्ण ने धरती लोक को छोड़ कर वैकुण्ड की तरफ प्रस्थान किया। और इसके बाद आरम्भ हुआ इस युग के अंतिम युग यानी कलयुग का।

कलयुग

कलयुग ऐसा युग है जिसे सबसे अँधेरा युग कहा जाता है। कियोंकि इस युग में न सिर्फ ज्ञान लुप्त होने लगता है बल्कि ज्ञान श्रोतों में भी छेड़ छाड़ शुरू हो जाती है। ज्ञान ही मोक्ष का रास्ता होता है। लेकिन ज्ञान अधूरा या ग़लत हो तो वह विनाश की तरफ ही ले जाता है। जिस तरह से द्वापरयुग में धर्म के दो ही स्तम्भ रह जाते हैं कलयुग तो उससे भी बुरा होता है। इसमें धर्म का सिर्फ एक ही स्तम्भ रह जाता है और वह है दया। ना तप रहता है न शुद्धि रहती है और सच्चाई का अंत द्वापरयुग के अंत के साथ ही हो जाता है।

सिर्फ दया के भाव में ही मनुष्य को जीवन का मक़सद पता चलता है। इस युग का कुल समय ४ लाख ३२ हज़ार साल का होता है। और इसकी शुरुआत तब हुई जब श्री कृष्ण ने विकुम्ब की तरफ प्रस्थान किया। इसी युग में ज्ञान लुप्त हो जाता है। इसका उदहारण आप अपने जीवन से ले सकते हैं। आपने हिन्दू धर्म के पुराणों की कई कथाएँ सुनी होंगी लेकिन क्या आपने खुद पढ़ी हैं ? क्या आपने पुराण पढ़ कर उनको समझा है ?आप सनातन धर्म के लिए मरने तक की बात करते हैं लेकिन क्या आपने श्रीमद भगवद गीता को अपने घर में रखा है ? और अगर रखा है तो क्या उसको पढ़ा है ?

यही है कलयुग जब ज्ञान किसी के पास नहीं रहता। कियोंकि पुराणों में ग़लत जानकारी को मिलाया जाता है इसी लिए श्री कृष्ण ने श्रीमद भगवद गीता का ज्ञान हमें दिया। और लुप्त ज्ञान को दोबारा जागृत किया। यही सनातन धर्म का अर्थ है। कलयुग के पहले दस हज़ार साल को सबसे बेहतर कहा जाता है। लेकिन उसके बाद अँधेरा युग आता है। इस युग में अध्यात्म को ही खत्म किया जाता है। इस युग में सिर्फ भौतिक ज्ञान को ही सच मन जाता है। इसी लिए अविष्कार भी केवल भौतिकी के ही किये जाते हैं।

इसका उदहारण है आज हमने टीवी मोबाइल बना लिया। दवाएं बनायीं मगर एक भी आविष्कार मानसिक स्तर का नहीं किया। यानि हमने Subconscious mind को access करने का तरीक़ा नहीं ढूंढा। जिस कारन हमारा शरीर ग्रस्त होता जा रहा है। इस युग के अंत तक मनुष्य की आयु दस से पचास साल तक रह जायेगी। निर्माण ही विनाश का कारण होगा। एक देश जब तरक़्क़ी करता है तो दोसरा देश उसे गिराने में लग जाता है। युद्ध आम बात हो जाती है। मनुष्य के पास सबकुछ होते हुए भी मन की शांति नहीं होती।

कई पुराणों में इस युग में दो विष्णु अवतार बताए गए हैं। जबकि कई पुराणों में इस युग में एक ही विष्णु अवतार बताया गया है। ये अवतार होगा कालकी अवतार जो कलयुग के अंत के समय आएंगे। वह अधर्म का अंत करके दोबारा सतयुग में ले जाएंगे। उससे पहले अधर्म चारों ओर अपनी जड़ें जमा लेगा। इसी लिए मोक्ष से बहुत भौतिक मूल्य हो जाएंगे। वासना ,लालच , ईर्ष्या ,अहंकार और अज्ञान ही हर तरफ होगा। इसी युग में अज्ञानी भी गुरु बनेंगे और धर्म को अधर्म की तरफ ले जाएंगे। झूठे मनुष्य खुद को भगवान् दिखाना शुरू कर देंगे। और लोग उनको सच भी मानेंगे।

लेकिन कलयुग में भी एक ज्ञान की किरण सबके पास होगी। वह होगा धर्म का आखरी स्तंभ यानि दया। दया के बहाव में मनुष्य सच को पहचान पायेगा। इस युग में भी मनुष्य मोक्ष का रास्ता ज्ञान से ढूंढ पायेगा। मुक्ति का मार्ग हर युग में एक ही है और वह है ज्ञान

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