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यूपी में आखिर किसने खाई सत्ता की मलाई!

उत्तर प्रदेश /UP election
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उत्तर प्रदेश में भाजपा के मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य की पार्टी से बगावत की खबरें तो आप ने सुनी ही होगी लेकिन उन्होंने भाजपा पर एक गम्भीर आरोप भी लगाया है जिसकी समीक्षा आवश्यक है। उन्होंने कहा है कि “यूपी में पिछड़ी जाति को सत्ता के मलाई से दूर रखा गया।” इसका बयान का क्या मतलब होता है? सत्ता की कितना मलाईदार होता है! और फिर उस मलाई को किसने खाया! स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि पिछड़ी जातियों को मलाई से दूर रखा गया। तो इसका मतलब यह होता है कि सत्ता की मलाई का बंटवारा जातियों के आधार पर होता है! अब कोई स्वामी प्रसाद मौर्य के पेट तक अंगुली कर यह समझ सकता है कि क्या वाकई में उन्हें मलाई से दूर रखा गया!

यूपी में सत्ता की मलाई से पिछड़ी जातियों को दूर रखा गया : स्वामी प्रसाद मौर्य

भाजपा के बगावती नेता समाजवादी पार्टी के साईकल पर सवार हो चुके स्वामी प्रसाद मौर्य ने खुल्लमखुल्ला आरोप लगाया है कि भाजपा के पूरे कार्यकाल में केवल सवर्णों को ही सत्ता की मलाई चखाई गयी है। उत्तर प्रदेश में स्वामी प्रसाद मौर्य ओबीसी के चर्चित नेता है। कभी मायावती की पार्टी बसपा में शामिल रहे मौर्य 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा में शामिल हो गए थे। अब इस विधानसभा चुनाव में वो समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं। राजनीति के जानकार के अनुसार स्वामी प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश का रामविलास पासवान कहा जाता है। यानी हमेशा अवसरवादी राजनीति के तहत पार्टी बदलते रहना। दल बदलू प्रवृत्ति के कारण ही स्वामी प्रसाद मौर्य को बिहार के रामविलास पासवान की तरह मौसम विज्ञानी भी कहा जाता है।

केवल स्वामी प्रसाद मौर्य ने ही भाजपा के बाग़ी नहीं

हालांकि केवल स्वामी प्रसाद मौर्य ही पिछड़ी जाति के अकेले नेता नहीं हैं जिसने भाजपा से बग़ावत की है। बगावती नेता में नंदकिशोर गुर्जर का नाम भी शामिल है। यूपी में नंदकिशोर गुर्जर और मौर्य दोनों पिछड़ी जाति से हैं तथा यहां पिछड़ी जाति की तकरीबन 44 फ़ीसदी वोट है। हालांकि नंदकुमार की लोकप्रियता उनके ही क्षेत्र तक सिमटी हुई है जबकि स्वामी प्रसाद मौर्य ज्यादा लोकप्रिय है। वो विधानसभा के कई सीटों को प्रभावित कर सकते है।

मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश में इस बार भाजपा एक विपक्षी पार्टियों से लड़ रही है तो दूसरी तरह सत्ता के मलाई के हिस्सेदारों के बीच भी आपसी लड़ाई ठन गए हैं। वही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थकों का कहना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य अनैतिक नेता है जो सत्ता को मलाई की नज़र से देखते हैं। योगी समर्थकों का कहना है कि यह लड़ाई सत्ता के प्रति जवाबदेही रखने वालों औऱ सत्ता को मलाई की तरह देखने वालों के बीच है।

सत्ता की मलाई का मतलब

सत्ता की मलाई का मतलब होता है सरकारी कॉन्ट्रैक्ट में हिस्सा, अवैध लेन-देन की मंज़ूरी, सत्ता घमंड और पुलिस पर सत्ताधारी नेता के दबदबा।इस बार योगी आदित्यनाथ ने किसी विधायकों को चलने नहीं दिया। अब देखना यह है कि इन बातों का प्रदेश की जनता पर क्या प्रभाव पड़ता है। जनता इन बातों को कैसे देखती है या नेताओं की आपसी कलह से ज्यादा महत्वपूर्ण हिंदुत्व का मसला बनता है कि नहीं न!

सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के बगावत और इन आरोपो के क्या मायने हैं ? इससे भाजपा को कितना खतरा है? वास्तव में भाजपा के लिए मौर्य की संकट की तरह ही उभरे हैं। क्योंकि उन्होंने लगातार जातिगत आधार पर बयान बाजी की है। अगर जनता जाति के आधार पर मतदान करने लगे तो भाजपा की हार हो सकती है। भाजपा हमेशा से यही चाहती है कि राज्य की राजनीति का मिजाज धर्म के आधार पर रहे और हिंदुत्व की बड़ा मसला बना रहे। इससे जाति के आधार पर वोटो का बिखराव रुक सके। लेकिन मौर्य ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नैरेटिव को धर्म से जाति की ओर शिफ़्ट कर दिया है जो भाजपा के लिए चिंता की बात है।

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