समुंद्र पर शायरी

समुंद्र पर शायरी

ये समुंद्र ही इजाज़त नहीं देता वर्ना
मैंने पानी पे तेरे नक़्श बना देने थे
अहसन मुनीर
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तुम समुंद्र की बात करते हो
लोग आँखों में डूब जाते हैं


आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंद्र नहीं देखा
बशीर बदर
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मैं इस्तिआरों की सरज़मीं में उतर के देखूं तो भेद पाऊँ
बशर मुसाफ़िर, हयात सहरा, यक़ीन साहिल, गुमाँ समुंद्र
अज़ल से बे-सम्त जुस्तजू का सफ़र है दरपेश पानियों को
किसे ख़बर किस को ढूंढता है मेरी तरह रायगां समुंद्र
मुहसिन नक़वी
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प्यास कहती है कि अब रेत निचोड़ी जाये
अपने हिस्से में समुंद्र नहीं आने वाला
ज़ीशान साजिद
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जिसको तूफ़ाँ से उलझने की हो आदत मुहसिन
ऐसी कश्ती को समुंद्र भी दुआ देता है
मुहसिन नक़वी

समुंद्र पर शायरी

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊंगा
मैं तो दरिया हूँ समुंद्र में उतर जाऊंगा
अहमद नदीम क़ासिमी
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समुंद्र में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
वसी शाह
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मैंने कुछ पानी बचा रखा था अपनी आँख में
इक समुंद्र अपने सूखे होंट लेकर आ गया
जलील आली
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हम तो समझे थे कि दो-चार ही आँसू होंगे
रोने बैठे तो समुंद्र के समुंद्र निकले
सिदरा अली
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मैंने अपनी ख़ुशक आँखों से लहू छलका दिया
इक समुंद्र कह रहा था मुझको पानी चाहीए
राहत इंदौरी
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हाय वो लोग जो कहते थे समुंद्र ख़ुद को
जब मेरी आँख में डूबे तो निशाँ तक ना मिला
नामालूम
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समुंद्र पर शायरी


नज़रों से नापता है समुंद्र की वुसअतें
साहिल पे एक शख़्स अकेला खड़ा हुआ
नामालूम

गिरते हैं समुंद्र में बड़े शौक़ से दरिया
लेकिन किसी दरिया में समुंद्र नहीं गिरता
क़तील शिफ़ाई
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उन्हें ठहरे समुंद्र ने डुबोया
जिन्हें तूफ़ाँ का अंदाज़ा बहुत था
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
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बंद हो जाता है कूज़े में कभी दरिया भी
और कभी क़तरा समुंद्र में बदल जाता है
फ़र्याद आज़र
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नज़र में सूरते साहिल अभी नहीं आई
मेरे सफ़र का हर इक मरहला समुंद्र है
ज़ाहिद फ़ारिहनी

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