ख़ुद्दारी पर शायरी

रूठ जाने पर शायरी

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मुझको आदत है रूठ जाने की
आप मुझको मना लिया कीजिये
जून ईलिया

हाय वो लोग हमसे रूठ गए
जिनको चाहा था ज़िंदगी की तरह
जावेद कमाल रामपूरी

ज़रा रूठ जाने पे इतनी ख़ुशामद
क़मर तुम बिगाड़ोगे आदत किसी की
क़मर जलालवी

ना जाने रूठ के बैठा है दिल का चैन कहाँ
मिले तो इस को हमारा कोई सलाम कहे
कलीम आजिज़

ये किस ख़ता पे रूठ गई चश्म-ए-इल्तिफ़ात
ये कब का इंतिक़ाम लिया मुझ ग़रीब से
शकील बद एवनी

रूठ जाने पर शायरी

इक हर्फ़-ए-शिकायत पर क्यों रूठ के जाते हो
जाने दो गए शिकवे आ जाओ मैं बाज़ आया
नातिक़ गुलाव ठी

ज़रा ज़रा सी शिकायत पे रूठ जाते हैं
नया नया है अभी शौक़-ए-दिल रुबाई का
जलील मानक पूरी

वो मुझसे रूठ ना जाती तो और क्या करती
मरी ख़ताएँ मरी लग़्ज़िशें ही ऐसी थीं
अनवर शऊर

ले चला जान मरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था ना आना तेरा
दाग़ध-ए-देहलवी

मुसलसल जागने के बाद ख़ाहिश रूठ जाती है
चलन सीखा है बच्चे की तरह उसने मचलने का
इक़बाल साजिद

रूठ जाने पर शायरी

शाम होती है तो लगता है कोई रूठ गया
और शब उस को मनाने में गुज़र जाती है
इशफ़ाक़ नासिर

ज़िंदगी-भर के लिए रूठ के जानेवाले
मैं अभी तक तरी तस्वीर लिए बैठा हूँ
क़ैसर अलजाफ़री

कभी कभी सफ़र ज़िंदगी से रूठ के हम
तिरे ख़्याल के साय में बैठ जाते हैं
कौसर जाइसी

यूं रूठ के जाने पे मैं ख़ामोश हूँ लेकिन
ये बात मरे दिल को गवारा तो नहीं है
महेश चन्द्र नक़्श

रूठ जाने पर शायरी

रूठ कर आँख के अंदर से निकल जाते हैं
अशक बच्चों की तरह घर से निकल जाते हैं
तौक़ीर तक़ी

मुस्कुरा कर उनका मिलना और बिछड़ना रूठ कर
बस यही दो लफ़्ज़ इक दिन दास्ताँ हो जाऐंगे
दानिशध अलीगढ़ी

इंतिहाई हसीन लगती है
जब वो करती है रूठ कर बातें
आसिम वास्ती

ज़िंदगी कट गई मनाते हुए
अब इरादा है रूठ जाने का
फ़र्हत शहज़ाद

एक बच्चा सा बेसबब जाज़ल
बैठा रहता है रूठ कर मुझमें
जीम जाज़ल

घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए
मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए
अज़हर इक़बाल

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