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क्या राहुल गांधी कांग्रेस के बहादुर शाह ज़फर हैं?

rahul gandhi
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राहुल गांधी का देश की राजनीति में सक्रिय हुए लगभग दो दशक पूरे होने वाले है लेकिन राहुल गांधी को अब तक सफल राजनेता की श्रेणी में नहीं गिना जाता है। हालांकि राहुल गांधी की सक्रियता हर साल बढ़ ही रही है लेकिन उनका कोई दमदार प्रदर्शन नहीं देखने को मिला है। पंजाब, छत्तीसगढ़ सरीखे कुछ गिने चुने राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी है। लोकसभा चुनाव में तो हमेशा निराशाजनक प्रदर्शन ही रहा है।

असफल Rahul Gandhi

बात सिर्फ चुनाव जीतने का ही नहीं है, राहुल गांधी कांग्रेसी राजनेताओं को सहेजे रखने में भी असफल हो रहे हैं।  देश के प्रसिद्ध गांधी-नेहरू परिवार के सदस्य होने के कारण राजनीतिक समीक्षकों को उनसे बड़ी सफलता की अपेक्षा रही है लेकिन राहुल गांधी ने लोगों को निराश ही किया है। देश के सबसे सफल परिवार के सदस्य का लगातार असफल होना निराशाजनक स्थिति है। वो अपने पारिवारिक विरासत की गरिमा को एक कदम भी आगे नहीं ले जा रहे है। ऐसे में यह सवाल पैदा होता है कि राहुल गांधी क्या कांग्रेस परिवार के बहादुरशाह जफर  सिद्ध हो रहे हैं? क्या कांग्रेस परिवार की राजनीतिक विरासत अब पूरी तरह बिखर चुकी है?

एक सफल नेता की छवि नहीं बन सकी

हालांकि कांग्रेस के नेता साल 2009 के आम चुनाव की सफलता का सारा श्रेय राहुल गांधी (Rahul Gandhi )को ही देते हैं। लेकिन देश के जनमानस में इनकी छवि एक सफल नेता की नहीं बनी है। राहुल गांधी जन सरोकार के मुद्दे से अपने आप को नहीं जोड़ पाते हैं। जैसे कई क्षेत्रीय पार्टियों के नेता कर लेते हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) बिहार में राजद के तेजस्वी यादव आदि कई नेता इसके उदाहरण है।

tejashwi yadav ने सही मुद्दा चुना था

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि क्षेत्रीय पार्टियों की पहचान किसी न किसी जाति से अवश्य जुड़ी होती है लेकिन ये पार्टियां भी जन सरोकार के मुद्दे को अपनी पार्टी से जोड़ कर वोट विस्तार कर लेते हैं। उदाहरण के लिए बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव में राजद के तेजस्वी यादव(tejashwi yadav) ने बेरोजगारी के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बना कर लगभग सभी जातियों से कुछ न् कुछ वोट प्राप्त किए। जबकि उनकी पार्टी की पहचान लंबे समय से यादव मुस्लिम समीकरण से जुड़ी है। ऐसा कुछ राहुल गांधी की तरफ़ से कांग्रेस के लिए नहीं देखा गया है।

राहुल गांधी का दुर्भाग्य

इसे राहुल गांधी का दुर्भाग्य ही कहे कि उनके हाथ में पार्टी का नेतृत्व आने के कुछ ही वर्षों बाद देश में मोदी का नेतृत्व उभर गया। जब राहुल गांधी सक्रिय जीवन में आए तो उन्हें नरेंद्र मोदी (Narendra Modi)जैसे सशक्त व्यक्तित्व का सामना करना पड़ रहा है।

नरेंद्र मोदी ने हिंदुत्व के एजेंडों के जरिए जातिगत बिखराव को एक जुट कर चुके हैं। जिससे क्षेत्रीय पार्टियों को भी चुनौती मिल रही है। क्षेत्रीय पार्टियां तो कांग्रेस के लिए भी चुनौती ही है। भाजपा से अधिक कांग्रेस के लिए चुनौती बन गयी है। क्योंकि कांग्रेस का मुस्लिम वोट अब बहुत हद तक क्षेत्रीय दलों में शिफ्ट हो चुका है। कांग्रेस के पास भाजपा के हिंदुत्व की तरह कोई ऐसा एजेंडा नहीं है क्षेत्रीय दलों के वोट को अपने पाले में ले आएं। आज की राजनीतिक में राहुल गांधी की राजनीति क्षेत्रीय दलों की पूरक बन चुकी है।

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