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प्रेमिका के लिए एक सुन्दर कविता

एक सुन्दर कविता
एक सुन्दर कविता

दुआए नीम शबी

अपने पाकीज़ा जज़्बों को गवाह बना कर
अब की बार भी ईद का चांद देखकर
मैं दुआ माँगूँ
अपने और तुम्हारे साथ की
बस तुम इतना करना
कि जब मेरी आँखों का नमकीन पानी
मेरी फैली हथेली पर गिरे
तो मेरी दुआए नीम शबी को मुकम्मल करना
मेरे मुक़द्दस लफ़्ज़ों की लाज रखना
सिदक़-ए-दिल से कहना आमीन ​

ईद आने को है मैंने सोचा बहुत
फूल भेजूँ कि महकार भेजूँ उसे
चंद कलीयों से शबनम के क़तरे लिए
उसके रुख़्सार पर आँसूओं की तरह
ख़ूबसूरत लगेंगे उसे भेज दूं
फिर ये सोचा नहीं—
उसके आरिज़ कहाँ गुल की पत्तियां कहाँ
उसके आँसू कहाँ शबनम के क़तरे कहाँ
फिर ये सोचा के—
कुछ चांद की चांदनी और सितारों की रोशनी भी साथ हो
मांग कर छीन कर जिस तरह भी हो मुम्किन उसे भेज दूं

फिर ये सोचा नहीं—-
उसकी आँखें कहाँ चांद तारे कहाँ
फिर ये सोचा के —-
थोड़ा सा नूर-ए-सह्र
मैं सह्र से चुरा कर उसे भेज दूं
फिर ये सोचा नहीं—
नूर उस का कहाँ नूर सुबह का कहाँ
फिर ये सोचा के —
घटाओं को ही भेज दूं
उसके आँगन में उतर कर रक़्स करती रहीं
फिर ये सोचा नहीं…
उसकी ज़ुल्फ़ें कहाँ ये घटाऐं कहाँ
फिर ये सोचा कि—-
एक मए से भरा जाम ही भेज दूं
फिर ये सोचा नहीं—-
सारे आलम के हैं जितने भी मैकदे
उसकी आँखों की मस्ती ही बाँटी गई
साग़र-ओ-मए कहाँ उस की आँखें कहाँ
उसके काबिल मुझे कुछ भी ना लगा
चांद ,तारे, हवा और ना ही घटा
मैं इसी सोच में था परेशान बहुत
कि किसी ने दी एक निदा इस तरह
याद करके उसे जितने आँसू गिरें
सबको यकजा करो और उसे भेज दो

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