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पिता पर शायरी

पिता पर शायरी
पिता पर शायरी

हमें पढ़ाओ ना रिश्तों की कोई और किताब
पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हमने
मेराज आबाद य

बेटियां बाप की आँखों में छिपे ख़्वाबको पहचानती हैं
और कोई दूसरा इस ख़्वाब को पढ़ ले तो बुरा मानती हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये सोच के माँ बाप की ख़िदमत में लगा हूँ
इस पेड़ का साया मरे बच्चों को मिलेगा
मुनव्वर राना

मुझको छाओं में रखा और ख़ुद भी वो जलता रहा
मैंने देखा इक फ़रिश्ता बाप की परछाई में
नामालूम

अज़ीज़-तर मुझे रखता है वो रग-ए-जाँ से
ये बात सच है मेरा बाप कम नहीं माँ से
ताहिर शहीर

उनके होने से बख़्त होते हैं
बाप घर के दरख़्त होते हैं
नामालूम

घर की इस बार मुकम्मल मैं तलाशी लूँगा
ग़म छुपा कर मेरे माँ बाप कहाँ रखते थे
नामालूम

पिता पर शायरी

मुद्दत के बाद ख़ाब में आया था मेरा बाप
और उसने मुझसे इतना कहा ख़ुश रहा करो
अब्बास ताबिश

बाप ज़ीना है जो ले जाता है ऊंचाई तक
माँ दुआ है जो सदा साया-फ़गन रहती है
सरफ़राज़ नवाज़

मुझको थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते
मेराज फ़ैज़ाबादी

जब भी वालिद की जफ़ा याद आई
अपने दादा की ख़ता याद आई
मुहम्मद यूसुफ़ पापा

उनका उठना नहीं है हश्र से कम
घर की दीवार बाप का साया
नामालूम

बच्चे मेरी उंगली थामे धीरे धीरे चलते थे
फिर वो आगे दौड़ गए में तन्हा पीछे छूट गया
ख़ालिद महमूद

वो पेड़ जिसकी छाओं में कटी थी उम्र गांव में
मैं चूम चूम थक गया मगर ये दिल भरा नहीं
हम्माद नियाज़ी

पिता पर शायरी

हड्डियां बाप की गूदे से हुई हैं ख़ाली
कम से कम अब तो ये बेटे भी कमाने लग जाएं
रऊफ़ ख़ैर

मैंने हाथों से बुझाई है दहकती हुई आग
अपने बच्चे के खिलौने को बचाने के लिए
शकील जमाली

मेरा भी एक बाप था अच्छा सा एक बाप
वो जिस जगह पहुंच के मरा था वहीं हूँ मैं
रईस फ़रोग़

सुब्ह-सवेरे नंगे-पाँव घास पे चलना ऐसा है
जैसे बाप का पहला बोसा ,क़ुरबत जैसे माओं की
हम्माद नियाज़ी

देर से आने पर वो ख़फ़ा था आख़िर मान गया
आज मैं अपने बाप से मिलने क़ब्रिस्तान गया
अफ़ज़ल ख़ान

मैं अपने बाप के सीने से फूल चुनता हूँ
सो जब भी सांस थमी बाग़ में टहल आया
हम्माद नियाज़ी

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