असलम हसन

आंचलिकता की ओट में | फणीश्वर नाथ रेणु

By असलम हसन

फणीश्वर नाथ रेणु रचित मैला आंचल को एक कालजयी उपन्यास का दर्जा प्राप्त है। उसमें पूर्णिया अंचल अपनी समग्रता में चित्रित हुआ है। असलम हसन इस लेख में इस बात को रेखांकित करते हैं कि पूर्णिया में एक बड़ी आबादी मुसलमानों की भी है। वे रेणु की नजरों से कैसे ओझल हो गए। रेणु की कहानियों में भी मुस्लिम परिवेश लगभग नदारद है। इसे लेखकीय के चूक तो नहीं कहा जा सकता मगर उन्हें नजरअंदाज करने के नजरिए को क्या खोज नहीं होनी चाहिए…

इलाकाई जिंदगी की गुरबत, बेचारगी, संघर्ष और सौंदर्य को फणीश्वर नाथ रेणु ने जिस बारीकी से उकेरा है उससे केवल सीमांचल का ही प्रतिनिधित्व नहीं होता बल्कि देश काल की संपूर्ण सामाजिक राजनीतिक संरचना की भी पड़ताल होती है। संभवत रेणु जी हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं में जातीय किरदारों का बेबाकी से चित्रण किया है। रेणु जी के जीते-जागते पात्र धर्मविशेष की जातीय संरचना के अनुरूप रचना संसार में अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं लेकिन हैरत की बात है कि “मैला आंचल” के कुशल चितरे के कैनवास पर गरीब, बेबस, लाचार इलाकाई मुसलमानों का मेला रंग नजर नहीं आता है।

जिस अंचल विशेष की धरती पर रेणु जी ने अपनी संवेदनाओं की लेखनी चलाई है वहां मुसलमानों की काफी आबादी है। पूर्णिया, कटिहार,अररिया किशनगंज इत्यादि जिले में ही मुख्य रूप से लेखक की रचना संसार की भाव भूमि है। यहां मुसलमान तबका आज भी कई पिछड़ी बिरादरी में बटा हुआ है। इलाके की कुल्हैया, सेखरा, मलदहिया (शेरशाहवादी) या सुरजापुरी मुस्लिम उपजातियां अपनी-अपनी विशेष बोली वाणी रहन-सहन के साथ उसी गांव समाज का हिस्सा है जहां से रेणु ने अपने जीवंत पात्रों का चयन किया है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर इलाके की बड़ी आबादी की जिंदगीयों के चित्रण में आंचलिक कथा शिल्पी रेणु कैसे पीछे रह गए।

‘पंचलाइट’की रोशनी में प्रगतिशील लेखक की नजर महतो टोली या वामन टोली पर तो पड़ती है मगर इसी जातिवाद का दंश झेलता हुआ आंचलिक मुस्लिम समाज रेणु जी की नजर से ओझल है। बात आगे बढ़ाने से पहले मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं सीमित समाज का एक पाठक हूं। रेणु जैसे महान रचनाकार को कोई आइना दिखाना मेरा मकसद नहीं है। मेरा प्रश्न मात्र इतना है कि जिस आंचलिकता के लिए आलोचकों ने रेणु जी स्थापित किया है क्या वह वाजिब है। जहां तक मैं समझता हूं आंचलिक साहित्य में अंचल विशेष का पूर्ण रूप चित्रण आवश्यक है। अंचल में मुस्लिम पात्रों या मुसलमानों के सामाजिक सांस्कृतिक भाव भूमिका प्रतिनिधित्व फणीश्वर नाथ रेणु के साहित्य संसार में उस रूप में नहीं हुआ है जो उन्हें अंचल विशेष का रचनाकार कहना कहां तक उचित है। अगर आलोचकों ने आंचलिकता की परिभाषा को रेणु की रचनाओं के अनुरूप आया है तो सवाल उठना वाजिब है कि अंचल के उस हिस्से की हिस्सेदारी कहां गई? क्यों लेखक की लेखनी मुसलमानों पर मौन है? क्यों रेणु के कथा संसार में मुस्लिम पात्र कौन हैं ? एक कथाकार के रूप में रेणु जी को इससे बरी किया जा सकता है क्योंकि किसी लेखक के लिए संभव नहीं है कि समाज के हर पहलु पर उसकी नजर पड़े। परिवेश विशेष या मुझ समुदाय विशेष पर किसी लेखक का लिखना या नहीं लिखना कोई साहित्यिक मुद्दा नहीं हो सकता। तब फिर यह मुद्दा क्यों, परिचय के तौर पर बताता चलूं कि मेरा संबंध उसी उपेक्षित अंचल से है। मेरा गांव “कमलदाहा” जिसका जिक्र रेणु जी कहीं-कहीं करते हैं उसी अररिया जिले में हैं जहां से अमर कथा शिल्पी रेनू ने अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत की थी। मैं हिंदी साहित्य का कभी विद्यार्थी नहीं रहा लेकिन अपनी माटी में महान रचनाकार की कहानियों और उपन्यासों के प्रति मेरा लगाव स्वभाविक रूप से रहा, आज तक कायम है। लेकिन एक बात आज तक का कचोटती रही कि रेणु जी के रचना संसार में हमारा गांव समाज कहां है ? आंचलिक भूले भटके मुस्लिम पात्र परिवेश कहीं-कहीं रेणु जी के यहां मिलते हैं जैसे “मैला आंचल” में उन्हें मेरा गांव कमलदाहा के मुस्लिम जमींदारों के बारे में कुछ पंक्तियां लिखी हैं। इसी तरह मलदहिया मुसलमान गाड़ीवान का भी कहीं दृष्टांत है। “संवदिया” कहानी में गुल मोहम्मद आगा काबुली पठान का खदान किरदार मिलता है।

इसी प्रकार ‘परती परिकथा” उपन्यास में कामरेड मकबूल या मीर शमसुद्दीन जैसे छोटे-छोटे राजनीतिक किरदार आजाद देश की अधकचरी राजनीति से हमारा परिचय तो कराते हैं लेकिन इनके सहारे पूरी मुस्लिम टोली की उबर खाबर सामाजिक सांस्कृतिक संरचना का ज्ञान नहीं मिलता है। बहुत बेबाकी और मुस्तैदी से रेणु ने अंचल विशेष के अन्य पहलुओं का चित्रण किया है। लेकिन मुसलमानों को लेकर लेखक की झिझक साफ दिखती है। “पलटू बाबू रोड” में रेणु जी बंगाली समाज की सजीव अक्काशी करते हैं जबकि इनकी जनसंख्या क्षेत्र विशेष में अधिक नहीं है। निस्संदेह फणीश्वर नाथ रेणु ने पूर्ववर्ती एवं समकालीन आंचलिक रचनाकारों से अलग अपनी लीक बनाई है। भारतीय सीमा के आखिरी छोर पर बसे भूले बिछड़े अल्हड़ गांव के सहारे रेणु ने संपूर्ण उत्तर भारतीय सामाजिक राजनीतिक रचना की कुशल पड़ताल की है। विश्व साहित्य में अपनी विशेषता रखने वाले रेणु अपनी दृष्टि संपन्नता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अंचल की वेदना को कलात्मक ढंग से जाना पहचाना है। मुफलिसी, बीमारी और जिंदगी के पेचोखम झेलते रेणु के लोगबाग लोक धुनों पर थिरक उठते हैं । दृष्टि संपन्न रेणु की बारीक नजर आंचलिक लोक संस्कृति में रचे बसे उन मुसलमानों पर कम पड़ती है जो आज भी अल्लाह या जमीला गाता है।

किराती संस्कृति की स्पष्ट छाप आज भी यहां के ग्रामीण मुस्लिम समाज पर देखी जा सकती है। आज फणीश्वर नाथ रेणु पर एक नई दृष्टि या बहस की आवश्यकता है। रेणु को मात्र अंचल के रचनाकार मानकर उन्हें एक सीमा रेखा में कैद रखना सीमांचल के इस लेखक के प्रति अन्याय है। जैसा कि निर्मल वर्मा ने रेणु के महत्व पर इशारा करते हुए लिखा है कि,” रेणु का महत्व उनकी आंचलिकता से नहीं, आंचलिकता के अतिक्रमण में निहित है। रघुवीर सहाय के विचार देखिए :

“जैसा कि हिंदी आलोचना जगत का स्वभाव रहा है विलक्षणता और विचित्र का खोज कर उससे चौकने को आतुर सह्रदयों ने रेणु की शैली को आंचलिक कह कर अपने को नागर जताने का प्रयत्न किया था। पर वह उनके अपने व्यक्तित्व की न् आंचलिक न् नागर बल्कि विश्वसनीय अभिव्यक्ति है । आंचलिक जैसी कोई शैली या विषय वस्तु भी होती है यह मानना राजनैतिक केंद्रीकरण के वजन पर किसी सार्वदेशिक साहित्य के दंभ की प्रतिष्ठा करना है।

आंचलिकता को लेकर मेरी तकनीकी समझ कच्ची हो सकती है। मेरा यह आलेख संभवत मेरे उन प्रश्नों का ही रूपांतरण है जो लंबे वक्त से मेरे जेहन में चले आ रहे थे। अंत में इतना और कहना चाहूंगा कि बाढ़ और मलेरिया के प्रकोप को झेलता हुआ आज भी उपेक्षित हमारा अंचल शायद रेणु जी के कारण ही विश्व में जाना जाता है। कुछ किरदारों के रहने नहीं रहने से महान रचनाकार की सीमा रेखा खींचना मूर्खता होगी। लेकिन हिंदी साहित्य के विद्वानों के प्रति समाज सम्मान के साथ में व्यक्तिगत संदेश भी स्पष्ट कहना चाहता हूं कि उनकी कहीं आंचलिकता की आड़ में कद्दावर रेणु के कद को एक हद में समेटने की कोशिश तो नहीं की गई है। मेरा आज भी मानना है कि रेणु हिंदी साहित्य में जातिवाद के शिकार हो गए और रेणु को वह हक नहीं मिला जिसके वह वाजिब हकदार थे।

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