पेट्रोल- डीजल की बढ़ती कीमत का सेक्रेड गेम : भारी टैक्स

पेट्रोल- डीजल की बढ़ती कीमत का सेक्रेड गेम : भारी टैक्स

देश के आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यहां की वित्तीय हालात बहुत खराब है। वित्तीय घाटे की भरपाई करने के लिए सरकार तेल पर भारी टैक्स लगा रही है।  एक अनुमान के मुताबिक  तेल पर टैक्स बढ़ाकर सरकार अब तक 20 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की आय अर्जित कर चुकी है। राजकोष भरने का बोझ पेट्रोलियम सेक्टर पर ज्यादा पड़ रहा है।

देश में पिछले कई दिनों से लगातार पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें बढ़ रही हैं। कुछ शहरों में पेट्रोल की कीमतें 100 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गए हैं। राजधानी दिल्ली में अभी एक लीटर पेट्रोल 89.54 रुपए तथा डीज़ल की क़ीमत भी प्रति लीटर 80.27 रुपए हो गई है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते दाम के पीछे पिछली सरकार के गलत और अदूरदर्शी नीति को जिम्मेदार बताया है। उन्होंने कहा, “क्या भारत जैसे एक विविध और सक्षम देश को एनर्जी इंपोर्ट पर निर्भर होना चाहिए ? मैं किसी की आलोचना नहीं करना चाहता, लेकिन मैं चाहता हूं कि अगर हमने इस मसले पर पहले फोकस किया होता तो हमारे मध्यम वर्ग को बोझ नहीं सहना पड़ता।”


विपक्षी पार्टियां तेल की ऊंची कीमतों को मुद्दा बना रही हैं। खास बात यह है कि देश में पेट्रोल-डीज़ल पर अधिक टैक्स लग जा रहा है। यह समझना बहुत जरूरी है कि इस भारी भड़कम टैक्स के लिए पिछली और वर्तमान सरकार में कौन सबसे अधिक जिम्मेदार है। दरअसल, 2013 तक पेट्रोल पर केंद्र और राज्य सरकार दोनों मिलकर लगभग 44 प्रतिशत टैक्स लगाते थे। जो   अब बढ़ाकर 100-110 प्रतिशत तक कर दिया गया है।

मनमोहन सरकार के समय कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत 120 डॉलर तक चला गया था। जबकि आज अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 63 डॉलर पर है। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय क़ीमत में गिरावट के बावजूद पेट्रोल 100 रुपये तक बढ़ गया है। दरअसल, 2015 से ही लगातार अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें कम हैं, खासकर सऊदी अरब की नीतियों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट हुई है। इसके बावजूद देश में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें बढ़ ही रही हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि इस समय दुनिया में सबसे अधिक टैक्स भारत में ही लग रहा है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद यहां पेट्रोल-डीज़ल के दाम सबसे अधिक है।यूके में 61 प्रतिशत, फ्रांस में 59 और यूएस में 21प्रतिशत टैक्स लग रहा है। जबकि देश में 100-110 प्रतिशत तक टैक्स लग रहा है। देश के आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यहां की वित्तीय हालात बहुत खराब है। वित्तीय घाटे की भरपाई करने के लिए सरकार तेल पर भारी टैक्स लगा रही है।  एक अनुमान के मुताबिक  तेल पर टैक्स बढ़ाकर सरकार अब तक 20 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की आय अर्जित कर चुकी है। राजकोष भरने का बोझ पेट्रोलियम सेक्टर पर ज्यादा पड़ रहा है।


तेल की बढ़ती कीमतों के महंगाई पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। रिज़र्व बैंक के अनुसार इस साल जनवरी में  होलसेल प्राइस इंडेक्स या डब्ल्यूपीआई बढ़कर 2 प्रतिशत पर पहुंच गया जबकि दिसंबर में ये 1.2  प्रतिशत था।

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