पेड़ पर शायरी

पेड़ पर शायरी

इन दरख़्तों से भी नाता जोड़िए
जिन दरख़्तों का कोई साया नहीं
रौनक नईम

आग भी बरसी दरख़्तों पर वहीं
काल बस्ती में जहां, पानी का था
सलीम शहज़ाद

फलदार दरख़्तों ने रिझाया तो मुझे भी
आज़ाद परिंदों के लिए शाख़-ओ-समर किया
बदर वास्ती

राह-रौ बच के चल दरख़्तों से
धूप दुश्मन नहीं है ,साये हैं
एजाज़ वारसी

वो जंगलों में दरख़्तों पे कूदते फिरना
बुरा बहुत था मगर आज से तो बेहतर था
मुहम्मद अलवी

आते हैं बर्ग-ओ-बार दरख़्तों के जिस्म पर
तुम भी उठाओ हाथ कि मौसम दुआ का है
असअद बद एवनी

इक ख़ौफ़ सा दरख़्तों पे तारी था रात-भर
पत्ते लरज़ रहे थे हवा के बग़ैर भी
फज़ील जाफ़री

पेड़ पर शायरी

हवा दरख़्तों से कहती है दुख के लहजे में
अभी मुझे कई सहराओं से गुज़रना है
असअद बद एवनी

ये सोच कर के दरख़्तों में छाओं होती है
यहां बबूल के साये में आ के बैठ गए
दुष्यंत कुमार

शरीफ़े के दरख़्तों में छिपा घर देख लेता हूँ
मैं आँखें बंद कर के घर के अंदर देख लेता हूँ
मुहम्मद अलवी

दरख़्तों पर परिंदे लौट आना चाहते हैं
ख़िज़ां रुत का गुज़र जाना ज़रूरी हो गया है
हैदर क़ुरैशी

वो जिन दरख़्तों की छाओं में से मुसाफ़िरों को उठा दिया था
उन्हीं दरख़्तों पे अगले मौसम जो फल ना उतरे तो लोग समझे
अहमद सलमान

कभी किताबों में फूल रखना कभी दरख़्तों पे नाम लिखना
हमें भी है याद आज तक वो नज़र से हर्फ़ सलाम लिखना
हुस्न रिज़वी

यादों के दरख़्तों की हसीं छाओं में जैसे
आता है कोई शख़्स बहुत दूर से चल के
ख़ुरशीद अहमद जामी

पेड़ पर शायरी

धूप साये की तरह फैल गई
इन दरख़्तों की दुआ लेने से
काशिफ़ हुसैन ग़ाइर

गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो
आँधियो तुमने दरख़्तों को गिराया होगा
कैफ़ भोपाली

पूछता फिरता हूँ में अपना पता जंगल से
आख़िरी बार दरख़्तों ने मुझे देखा था
आबिद मुल्क

जो साय बिछाते हैं फल फूल लुटाते हैं
अब ऐसे दरख़्तों को इन्सान कहा जाये
असग़र मह्दी होश

वही सफ़्फ़ाक हवाओं का सदफ़ बनते हैं
जिन दरख़्तों का निकलता हुआ क़द होता है
शाहिद मीर

ये और बात कि रंग-ए-बहार कम होगा
नई रुतों में दरख़्तों का बार कम होगा
आनिस

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