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पाखंड (मुनाफ़कत) पर शायरी

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पाखंड(मुनाफ़कत)पर शायरी
पाखंड(मुनाफ़कत)पर शायरी

मुनाफ़क़त का निसाब पढ़ कर मोहब्बतों की किताब लिखना
बहुत कठिन है ख़िज़ां के माथे पे दास्तान-ए-गुलाब लिखना
मुहसिन नक़वी
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तुम अब तक मुनाफ़िक़ दिलों में रही हो
मेरे दिल की आब-ओ-हवा मुख़्तलिफ़ है
एम-ए अबदुल्लाह
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सीख थोड़ी मुनाफ़क़त वर्ना
लोग दीवार से लगा देंगे
ज़ीशान साजिद
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अच्छे कपड़े, अच्छा खाना, महंगी जूती, ऊंचा घर
काले दिल और घटिया सोच, सस्ते शौक़, मुनाफ़िक़ लोग
अहमद शुऐब
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मुम्किन नहीं है मुझसे ये तर्ज़-ए-मुनाफ़क़त
दुनिया तेरे मिज़ाज का बंदा नहीं हूँ मैं
अल्लामा इक़बाल

थोड़ा मोमिन ज़रा मुनाफ़िक़ हूँ
मैं भी माहौल के मुताबिक़ हूँ
आमिर राना
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ये दुख नहीं कि ज़माना ख़िलाफ़ है मेरे
ये रंज है कि मेरा यार भी मुनाफ़िक़ है
अज़ीज़ शाकिर
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पाखंड(मुनाफ़कत)पर शायरी


ये शहर-ए-तिलसमात है कुछ कह नहीं सकते
पहलू में खड़ा शख़्स मसीहा कि बला है
जहांगीर इमरान
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ताल्लुक़ कितना गहरा, रब्त कितना ख़ूबसूरत है
लबों पर मुस्कुराहट और सीनों में कुदूरत है
नामालूम

कमज़र्फ़ मुनाफ़िक़ थे सो अफ़सोस नहीं है
जो लोग मेरे हलक़ा -ए-अहबाब से निकले
इरशाद नियाज़ी
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बता के साँप को हैरान कर दिया मैंने
हमारा ज़हर हमारे दिलों में होता है
रफ़ी रज़ा
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जो अहल-ए-इशक़ हैं सब निज़द-ए-जां रखेंगे मुझे
मुनाफ़क़ीन भला क्या समझ सकेंगे मुझे
नामालूम
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मैं पांव धो के पियूँ यार बन के जो आए
मुनाफ़िक़ों को तो मैं मुँह लगाने वाला नहीं
तहज़ीब हाफ़ी
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मैं तो समझा था कि दो चार ही होते होंगे
पर तेरे शहर का हर शख़्स मुनाफ़िक़ निकला
नामालूम

Read Hindi Shayari

दिल मुनाफ़िक़ था शब-ए-हिजर में रोया कैसा
और जब तुझसे मिला टूट के रोया कैसा
अहमद फ़राज़
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दुनिया में क़तील उस सा मुनाफ़िक़ नहीं कोई
जो ज़ुलम तो सहता है बग़ावत नहीं करता
क़तील शिफ़ाई
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वही सिफ़ात-ओ-ख़साइल हैं और वही लहजे
ये लोग पहले कभी भेड़ीए रहे होंगे
फ़रेहा नक़वी

तुम मस्लिहत कहो या मुनाफ़िक़ कहो मुझे
दिल में मगर ग़ुबार बहुत देर तक रहा
ख़ालिद मुल्क साहिल
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ज़िंदगी तुझ सा मुनाफ़िक़ भी कोई क्या होगा
तेरा शहकार हूँ और तेरा ही मारा हुआ हूँ
अहमद फ़रीद

ज़हर लगता है ये आदत के मुताबिक़ मुझको
कुछ मुनाफ़िक़ भी बताते हैं मुनाफ़िक़ मुझको
अंजुम बारह बंकवी
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पाखंड(मुनाफ़कत)पर शायरी


मिरा हर इक मुनाफ़िक़ यार मुझसे
ख़ुलूस दोस्ताना मांगता है
बख़श लायलपूरी
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जो मुनाफ़िक़ हैं उनसे दूर रहो
धड़कनों की सदा सुनो अपनी
अज़ीम कामिल
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ख़ुश आए तुझे शहर-ए-मुनाफ़िक़ की अमीरी
हम लोगों को सच्च कहने की आदत भी बहुत थी
परवीन शाकिर
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सवाल ही ना था दुश्मन की फ़त्हयाबी का
हमारी सफ़ में मुनाफ़िक़ अगर नहीं आते
माहिर अबदालही

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हवा अच्छी है इसकी और ना पानी इसका अच्छा है
मैं इस शहर-ए-मुनाफ़िक़ में तो इक दिन रह नहीं सकता
हनीफ़ नजमी
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ऐसा बदला हूँ तेरे शहर का पानी पी कर
झूट बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझको
मुहसिन नक़वी

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