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RCP सिंह के उभरते नेतृत्व से डर गए नीतीश कुमार

यह तो अब बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है कि RCP सिंह के उभरते नेतृत्व से नीतीश कुमार डर चुके है। क्योंकि हाल के दिनों में RCP सिंह के साथ जो हुआ है उसे नीतीश कुमार का डर कहा जा सकता है।

RCP सिंह जैसे ही राष्ट्रीय अध्यक्ष बने उन्होंने अपने नेतृत्व कौशल के बदौलत बिहार में बड़ी तेजी से लोकप्रिय होने लगे थे। बिहार के सभी धर्मों और सभी जातियों में उनकी लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही थी। साथ ही कुर्मी समाज भी उनके नजदीक होता जा रहा था। आलम यह हुआ कि नीतीश कुमार को यह भय होने लगा की कहीं सत प्रतिशत कुर्मी समाज RCP सिंह को अपना नेता न स्वीकार ले । क्योंकि आज की तारीख में नीतीश कुमार का जनाधार किसी जाति में नहीं है और कुर्मी समाज में भी जनाधार घटा है। इस लिए नीतीश कुमार को चिंता होने लगी की कहीं उनकी रही सही ज़मीन ही न खिसक जाए। मगर बात ये थी की वो सीधे उन्हें इस पद से हटा नहीं सकते थे इससे उनकी इमेज को ठेस पहुंचती औऱ फिर उन्होंने अपनी धूर्तता दिखाते हुए अपनी ही पार्टी के लोकप्रिय, काबिल और वफादार नेता के खिलाफ साजिशों की कतार लगा दी।

उन्होंने साजिश की शतरंज बिछाई और पहली चाल चल कर RCP सिंह को मंत्री बनने की बात कही। RCP सिंह के लिए नीतीश कुमार की हर बात हुक्म का दर्जा रखती थी सो वो सहर्ष मंत्री बनने के लिए तैयार हो गए अपनी सादगी की वजह से असली चाल समझ नहीं पाए । ये बात सभी जानते हैं की मंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने फोन पर बधाई दी और ललन सिंह भी जानते थे की मुख्य मंत्री की स्वकृति से ही RCP सिंह ने ये पद लिया है।यह तो जग जाहिर है कि नीतीश कुमार के इस निर्णय पर खुशी जताते हुए ललन सिंह ने भी मंत्री बनने की बधाई दी। फिर मंत्री बनने के बाद नीतिश कुमार ने सोची समझी योजना के तहत मीडिया में मौन अवस्था बनाए रखी और सार्वजनिक तौर पर बधाई नहीं दी। इस तरह एक शंका का माहौल तैयार होने लगा।

इसके बाद फिर शुरू हुआ साजिशों का नया दौर।हद तो तब हो गई जब RCP सिंह की बढ़ती लोकप्रियता से डरे नीतीश कुमार ने अपनी ही पार्टी के अंदर गुटबाजी को बढ़ावा देना शुरू किया। उन्होंने इसके लिए ललन सिंह के गुट को हवा दी और यह खेमा RCP सिंह के खिलाफ हमलावर हो गया। याद रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब कैबिनेट विस्तार के वक्त जदयू से किसी एक नेता को मंत्री बनाने की बात कही तो नीतीश कुमार ने RCP सिंह को ही मंत्री बनने पर सहमति जताई थी।

RCP सिंह पर मंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से हटने का दवाब बनाया गया। ललन सिंह के जरिये दवाव की राजनीति की गई। नतीजन उन्होंने सहर्ष अपने पद को छोड़ दिया। लेकिन इससे जनता की नज़रों में उनका कद और बढ़ ही गया। इसके बाद एक के बाद एक ऐसे फैसले लिए गए जिससे RCP सिंह के पूर्व में लिए फैसले को पलटा जा सके। पार्टी का जन विस्तार तो रुक गया औऱ पार्टी खेमेबाजी का शिकार होती चली गयी।

इधर RCP सिंह जिस तरह अपने नेतृत्व कौशल के बदौलत से जनता के बीच लोकप्रिय हुए थे ठीक वैसे ही अपनी सूझ बूझ और पारदर्शी व्यक्तित्व और मेहनत की वजह से मोदी सरकार में भी चर्चित हो गए। मंत्री पद संभालने के बाद RCP सिंह अपने कामकाजी कौशल से प्रधानमंत्री के और नजदीक चले गए। नीतीश कुमार इससे और चिंतित हो गए। उन्हें इस बात की चिंता होने लगी कि बढ़ती लोकप्रियता और प्रधानमंत्री के सानिध्य से RCP सिंह कहीं मुख्यमंत्री पद के दावेदार न् हो जाएं। नतीजतन एक और गहरी साजिश के तहत उन्हें राज्यसभा के टिकट नहीं दिया जाने लगा। टिकट की घोषणा जानबूझकर चुनाव के आखिरी वक्त में की गई ताकि इन्हें भाजपा की ओर से टिकट न् मिल जाये। मुख्यमंत्री को इस बात का खौफ रहा कि अगर ये दुबारा राज्यसभा में चले गए तो अपने कामकाज के बदौलत ये मोदी सरकार के लोकप्रिय मंत्री बन सकते है।

आज तो आलम यह है कि RCP सिंह के पक्ष में उठने वाले हर आवाज को बड़ी तेजी से दबाया जा रहा है। पार्टी के कद्दावर प्रवक्ता अजय आलोक इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। उन्हें सच बोलने का दण्ड दिया गया। सबसे बड़ी बात तो यह है कि नीतीश कुमार अब इस हद तक छिछले स्तर तक पहुंच गए कि उन्होंने इनका बंगला तक छीन लिया है। नीतीश कुमार खौफ का ऐसा मंज़र बनाना चाहते है कि पार्टी में अब कोई एक शब्द भी सच न् बोल सके ।

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