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पिता के कंधे पर बसता बच्चों के सुख का संसार

नेहा कथूरिया
नेहा कथूरिया

नेहा कथूरिया

ईश्वर के बाद इस धरती में जो पालन हार है वो हमारे माता पिता ही है। ईश्वर को तो हमने देखा नहीं है लेकिन पग पग में उनकी उपस्थिति को महसूस किया है।

माता पिता से ज्यादा हमारा इस दुनिया में कोई भी सगा मित्र या हमदर्द नहीं है चाहे कितने ही दोस्त यार,रिश्तेदार क्यूं ना हो,बुरे वक्त में जो तन मन धन से हमारे साथ खड़े होंगे वो सिर्फ और सिर्फ माता पिता ही होंगे। माता तो माता ही होती है उनका पद तो सबसे ऊंचा है उनका दिल कितना बड़ा होता है ये तो सभी जानते है वो अपने बहुत से बच्चों को एक ही नजर से बिना अंतर किए प्यार और अपने बलिदान से बड़ा करती है लेकिन हम ये भूल जाते है कि इन सबमें जो मुख्य भूमिका है वो है पिता की.

परिवार बनाने में जो व्यक्ति नीवं की ईंट का कार्य करता है वो सिर्फ पिता ही होता है। आज सोचा कुछ पिता की भी बात कर ली जाए, माता तो सदैव ही पूजनीय थी, है और जन्मों जन्मांतर तक रहेगी इसमें कोई शक है ही नहीं ना ही किसी से कोई मुकाबला.लेकिन आज ज़िक्र पिता का कर रही हूं।

वर्षों पहले के पिता और आजकल के पिताओं में ज़मीन आसमान का फर्क है उनके कार्य, उनके प्यार, दुलार,चिंता फिक्र में पहले भी वो ही था जो आज है इसमें कोई शक नहीं है लेकिन आज उनका स्वरूप बिल्कुल बदल गया है.पिता ने माता का दर्जा अपना लिया है।

पहले के पिता अपने बच्चो से  ना तो इतना बात ही करते थे ना ही उनको अपने सिर ही चढ़ाते थे, ना ही इतना प्यार दर्शा पाते थे क्यूंकि संयुक्त परिवार हुआ करते है। घर में बच्चों के लालन पोषण के लिए दादी , भुआये,मौसियां ,बहने हुआ करती थी, तो बहुत सारे बच्चे होने के बावजूद कोई दिक्कत नहीं आती थी…और बड़े बुजुर्गों के सामने भी उनको मर्यादित रहना पड़ता था। हमारे बुजुर्ग बताते है कि शायद उनका अपने बच्चों को बेटा कहना भी शर्म के दायरे में आता था ,छुप कर बच्चो को प्यार किया करता था पुरुष वर्ग.

पिता यानी एक डर ,एक इज्जत का नाम हुआ करता था। कोई भी बात मम्मी के द्वारा ही उन तक पहुचाई जा सकती थी .सीधी नहीं.उनका एक रौब हुआ करता था उनकी एक डांट मात्र से बच्चे डर जाया करते थे, उनका तेज़ी से नाम लेकर पुकारना ही काफी हुआ करता था।

लेकिन आजकल आधुनिक युग है। एकल परिवार है माता पिता बहू बेटे .ज्यादा से ज्यादा 4-5 लोग ही घर में दिखाई देते है तो क्या किया जाए,अब साथ उठना बैठना होता है पर्दा प्रथा समाप्त हो गई .

 पिता भी अब अपनी जिम्मेदारियों के प्रति कुछ ज्यादा ही सजग हो गए है बच्चे भी एक दो ही होते है इस महंगाई के ज़माने में, सो अब बच्चों की कद्र भी ज्यादा होने लगी। 

आजकल पति यानी बच्चों के  पिता हर कदम में पत्नी के साथ कंधे से कंधे मिलाकर कार्य करवाते है। इसमें कोई झिझक नहीं होती ,वो पत्नी की भावनाओं से वाकिफ होते है उनके दर्द तकलीफ़ को पहचानने लगे है। पूरा साथ हर  क्षण दे रहे हैं ये अच्छे संकेत है।

आप भी कहीं जाते है है तो पिता को ही बच्चो को गोद में लिए देखते होंगे, पहले ये नहीं हो पाता था, आजकल पत्नियों को आराम से खरीददारी करते हुए देखा जा सकता है। आमदनी के श्रोत अच्छे हो गए है, परिवार के प्रति जिम्मेदारियां नगण्य है अब तो पिता का प्रेम बच्चो के प्रति ऐसा झलकता है  बच्चे भी मां से ज्यादा पिता के पास खुश रहते है,पिता का अपने बच्चों को प्यार से तरह तरह के नामों से पुकारना ,नित नए खिलौने लाना, रोज तरह तरह के कपड़े खरीदना आदि भांति भांति के लाड़ पिता द्वारा लडाए जाते है, डांट फटकार का ज़माना तो शायद चला ही गया। बच्चे मम्मी से ज्यादा डरने लगे है पिता के मुकाबले ..ऐसा मैंने महसूस किया है ,बेटियां तो पिता की जान ही होती है.. पुत्रों के मुकाबले ज्यादा लाडली है अपने पापा की..क्यूंकि लड़कियां होती ही है इतनी अच्छी और हमदर्द , पिता के प्रति उनका प्यार भी कुछ ज्यादा ही होता है ये सभी जानते है वो दोहरी जिम्मेदारी निभाकर भी ससुराल और पीहर को सम्हालने का हुनर रखती है.

आजकल पिता भी एक निवाला बच्चे के बिना नहीं लेते , उन्होंने खाया की नहीं ,खुद से पहले उनका ख्याल रखते है ,दिन तो क्या रात में भी जाग जाग कर पत्नी के बराबर उसे बड़ा करने में मदद करते है.मैंने स्वयं एक पिता को बच्चों के लिए तडफता देखा है,मुझे ऐसा लगता है कि मां से कहीं कम नहीं है पिता का अपने बच्चे के प्रति प्यार और समर्पण.

मेरा ऐसा मानना है कि पिता की दोहरी जिम्मेदारियां होती है एक अपने स्वयं के माता पिता ,पत्नी की और दूसरी ओर अपने बच्चो के प्रति .हम स्त्रियां और बच्चे तो फरमाइश कर देते है लेकिन आर्थिक भार तो उन्हें ही उठाना पड़ता है। वो कैसे तैसे इन सबको सम्हालते है, हम सब की खुशी के लिए अपनी खुशी और इच्छाओं का त्याग कर देते है ताकि उनका परिवार हंस सके,खुश रह सके. उनके त्याग और बलिदान को सलाम। एक पिता के साए में बच्चे कितने सुरक्षित है ये तो हम सभी को ज्ञात है.ईश्वर सभी बच्चों पर उनके पिता का साया बनाए रखे, ताकि वो सही मार्ग पर अग्रसर हो सकें ,समय समय पर उनकी उपस्थिति बच्चों का मनोबल ऊंचा करने में सहायक हो सके। उन्हें जीवन में कठिनाई का सामना ना करना पड़े, उनकी छत्र छाया हमेशा बनी रही, मां की खुशी भी इसी में है पिता है तो ही घर है .अतः हमें मां के बराबर ही सम्मान पिता को भी देना चाहिए क्योंकि उनके बिना  परिवार अधूरा है.

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