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नैतिकता पर शायरी

नैतिकता पर शायरी
नैतिकता पर शायरी

दोस्ती के नए आदाब लिए फिरते हैं
लोग अब इतर में तेज़ाब लिए फिरते हैं
फ़सीह अल्लाह नक़ीब

हम लोग तो अख़लाक़ भी रख आए हैं साहिल
रद्दी के इसी ढेर में आदाब पड़े थे
ख़ालिद मुल्क साहिल

बस-कि दुशवार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना
मिर्ज़ा ग़ालिब

हर शख़्स बना लेता है अख़लाक़ का मयार
अपने लिए कुछ और, ज़माने के लिए और
नामालूम

अख़लाक़ का बयाँ हो जा
मुहब्बत की ज़बां हो जा
नामालूम

ये हम हैं कि अपनों के दिल ना जीत सके
वो तो दुश्मनों को भी अपनाए बैठे हैं
नामालूम

नैतिकता पर शायरी

कब कौन किसी का होता है
सब झूटे रिश्ते नाते हैं
सब दिल रखने की बातें हैं
सब असली रूप छुपाते हैं
अख़लाक़ से ख़ाली लोग यहां
लफ़्ज़ों के तीर चलाते हैं


मज़हब की ख़राबी है ना अख़लाक़ की पस्ती
दुनिया के मसाइब का सबब और ही कुछ है
फ़िराक़-गोरखपुरी
۔
अख़लाक़-ओ-शराफ़त का अंधेरा है वो घर में
जलते नहीं मासूम गुनाहों के दिए भी
फज़ील जाफ़री

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ये सारी बातें हैं दरहक़ीक़त हमारे अख़लाक़ के मुनाफ़ी
सुनें बुराई ना हम किसी की ना ख़ुद किसी को बुरा कहें हम
आतिश
۔
ज़माने से मुहब्बत का अभी तक
ये हासिल है कि कुछ हासिल नहीं है
अख़लाक़ बंदवी

पास आदाब तिरे हुस्न का करते करते
तुझको देखा भी कभी हूँगा तो डरते डरते
इशक़ औरंगबादी
۔
दरस आदाब-ए-जुनूँ याद दिलाने वाले
आ गए फिर मेरी ज़ंजीर हिलाने वाले
असलम अंसारी
۔

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