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मीर तक़ी मीर के प्रख्यात अशआर

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Meer Taqi Meer
Meer Taqi Meer

मीर तक़ी मीर के उर्दू के प्रख्यात कवी हैं। उनकी शाइरी पूरी दुनिया मैं पढ़ी जाती है। वह उर्दू ग़ज़ल के प्रमुख कवियों में से एक थे और उन्हें अक्सर उर्दू भाषा के सर्वश्रेष्ठ कवियों में सबसे बड़े कवी के रूप में याद किया जाता है। थिंकर बाबू (thinkerbabu) पर आप मीर तक़ी मीर के अच्छे शेर का संकलन पढ़ सकते हैं।

कौन थे मीर तक़ी मीर ?

मीर तकी मीर का असली नाम मीर मुहम्मद तकी था। ये 18वीं शताब्दी के मुगल काल भारत के एक प्रख्यात उर्दू कवि थे और उन अग्रदूतों में से एक थे जिन्होंने उर्दू भाषा को एक नया रूप नया आकार दिया।

मीर तकी मीर का देहांत कब हुआ ?

21 सितंबर 1810 को उनकी मृत्यु लखनऊ, उत्तेर प्रदेश में हुई। उन्हें लखनऊ में ही दफनाया गया। यह माना जाता है कि क़ब्र को उस समय हटा दिया गया था जब उनकी कब्र पर रेलवे ट्रैक बनाए गए थे।

सहल इस क़दर नहीं है मुश्किलपसंदी अपनी
जो तुझको देखते हैं मुझको सराहते हैं

तुम्हे भी चाहिए है कुछ तो पास चाहत का
हम अपनी और से यूँ कब तलक निबाह करें

तू परी,शीशे से नाज़ुक है ,न कर दावा-ए-मेह्र
दिल है पत्थर के उन्हों के जो वफ़ा करते हैं

मज़हब से मेरे क्या तुझे,तेरा दयार और
मैं और,यार और,मेरा कारो-बार और

जौरे-दिलबर से क्या हों आज़ुर्दा
‘मीर’ इस चार दिन के जीने पर

दिल वो नगर नहीं ,कि फिर आबाद हो सके
पछताओगे ,सुनो हो ,ये बस्ती उजाड़ के

मीर साहब ज़माना नाज़ुक है
दोनों हाथों से थामिए दस्तार

मीर साहब भी उसके ही थे ,लेक
बंदा-ए-ज़र-ख़रीद के मानिंद

बेकली ,बेख़ुदी कुछ आज नहीं
एक मुद्दत से वो मिज़ाज नहीं

न मिल मीर ,अबके अमीरों से तू
हुए हैं फ़क़ीर ,उनकी दौलत से तू

मीर तक़ी मीर के प्रख्यात अशआर

ग़ाफ़िल न अपनी दीदा दराई से,हमको जान
सब देखते हैं ,पर नहीं कहते हया से हम

यही जाना कि कुछ न जाना ,हाय
सो भी इक उम्र में ,हुआ मालूम

ज़ुल्म है,क़ह्र है,क़यामत है
ग़ुस्से में ,उसके ज़ेरे-लब की बात

चोर,उचक्के,सिख,मरहट्टे,शाहो-गदा ज़रख्वाहाँ हैं
चैन में हैं जो कुछ नहीं रखते,फ़क़्र ही इक दौलत है अब

रखे रहते हैं दिल पर हाथ ,अय मीर
यहीं शायद कि है सब ग़म हमारा

मीर सदा बेहाल रहो हो ,मेह्रो-वफ़ा सब करते हैं
तुमने इश्क़ किया तो साहब,क्या यह अपना हाल किया

वही है रोना,वही है कुढ़ना ,वही है सोजिश जवानी की सी
बुढ़ापा आया है इश्क़ ही में,प मेरे हमको न ढंग आया

उम्र आवारगी में सब गुज़री
कुछ ठिकाना नहीं दिलो-जाँ का

रहने के क़ाबिल तो हरगिज़ थी न यह इबरतसराय
इत्त्फ़ाक़न इस तरफ़ अपना भी आना हो गया

ख़ाक में मिल के मीर हम समझे
बेअदाई थी,आस्माँ की अदा

मीर तक़ी मीर के प्रख्यात अशआर

पशेमाँ हुआ दोस्ती करके मैं
बहुत मुझको अरमान था चाह का

बात कहने में गालियाँ दे है
सुनते हो,मेरे बदज़बां की अदा

पाते हैं अपने हाल में मजबूर सबको हम
कहने को इख़तियार है ,पर इख़तियार क्या

पाँव के नीचे की मिट्टी भी न होगी हम सी
क्या कहें,उम्र को किस तौर बसर हमने किया

तूने हमेशा जौरो-सितम बेसबब किए
अपना ही ज़र्फ़ था ,जो न पूछा सबब है क्या

अब भी दिमाग़े-रफ़्ता हमारा है अर्श पर
गो आस्माँ ने ख़ाक में हमको मिला दिया

ख़ुश रहा ,जब तलक रहा जीता
मीर,मालूम है क़लन्दर था

मेरे रोने की हक़ीक़त जिसमें थी
एक मुद्दत तक वो काग़ज़ नम रहा

सरसरी तुम जहान से गुज़रे
वरना हर जा,जहान-ए-दीगर था

दैरो-हरम से गुज़रे ,अब दिल है घर हमारा
है ख़त्म इस आब्ले पर ,सैरो-सफ़र हमारा

मीर तक़ी मीर के प्रख्यात अशआर

इब्तदा ही में मर गए सब यार
इश्क़ की कौन इन्तहा लाया

क़द्र रखती न थी मता-ए-दिल
सारे आलम में मैं दिखा लाया

दिल से रुख़सत हुई कोई ख़्वाहिश
गिरिया कुछ बेसबब नहीं आता

हैं मुश्ते-ख़ाक लेकिन ,जो कुछ हैं मीर हम हैं
मक़दूर से ज़ियादा मक़दूर है हमारा

नमूद कर के वहीं बह्रे-ग़म में बैठ गया
कहे तू ,मीर भी इक बुलबुला था पानी का

यह तवह्हुम का कारख़ाना है
याँ वही है जो एतबार किया

हक़ ढूँढने का आपको आता नहीं,वरना
आलम है सभी यार ,कहाँ यार न पाया

दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
यह नगर सौ मर्तबा लूटा गया

जिन बलाओं को मीर सुनते थे
उनको इस रोज़गार में देखा

बेकसी मुद्दत तलक बरसा की,अपनी गोर पर
जो हमारी ख़ाक पर से हो के गुज़रा ,रो पड़ा

मीर के प्रख्यात अशआर

मेरे सलीक़े से मेरी निभी मुहब्बत में
तमाम उम्र ,मैं नाकामियों से काम लिया

आबाद जिसमें तुझको देखा था एक मुद्दत
उस दिल की मुम्लिकत को,अब हम ख़राब देखा

शाम से,कुछ बुझा सा रहता है
दिल है गोया चराग़ मुफ़्लिस का

ताब किसको,जो हाले-मीर सुने
हाल ही और कुछ है मज्लिस का

जाने का नहीं शोर , सुख़न का मेरे हरगिज़
ता हश्र जहाँ में मेरा दीवान रहेगा

नाहक़ हम मजबूरों पर यह तोहमत है मुख़तारी की
जो चाहो सो आप करो हो हमको अबस बदनाम किया

दरहमी हाल की है ,सारे मेरे दीवाँ में
सैर कर तू भी ,यह मजमूआ परीशानी का

मुझको शाइर न कहू मीर कि साहब मैंने
दर्दो-ग़म कितने किये जमा तो दीवान किया

हम ख़ाक में मिले तो मिले लेकिन अय सिपह्र
उस शोख़ को भी राह पे लाना ज़रूर था

हम तौरे-इश्क़ से तो वाकिफ़ नहीं हैं लेकिन
सीने में जैसे कोई दिल को मला करे है

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