मौत पर शायरी

मौत पर शायरी

फ़ानी हम तो जीते-जी वो मय्यत हैं बे गोर-ओ-कफ़न
ग़ुर्बत जिसको रास ना आई और वतन भी छूट गया
फ़ानी बद एवनी
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दफ़न जब ख़ाक में हम सोख़्ता-सामाँ होंगे
फ़िल्स-ए-माही के गुल शम-ए-शबिस्ताँ होंगे
मोमिन ख़ां मोमिन
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दफ़न हम हो चुके तो कहते हैं
इस गुनहगार का ख़ुदा-हाफ़िज़
सख़ी लखनवी
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डूबने वाले की मय्यत पर लाखों रोने वाले हैं
फूट फूटकर जो रोते हैं वही डुबोने वाले हैं
फ़ना निज़ामी कांपूरी
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कर के दफ़न अपने पराए चल दिए
बेकसी का क़ब्र पर मातम रहा
अहसन मारहरवी

है जनाज़ा इस लिए भारी मिरा
हसरतें दिल की लिए जाते हैं हम
गोया फ़क़ीर मुहम्मद

मौत पर शायरी


डूबने वाले की मय्यत पर लाखों रोने वाले हैं
फूट फूटकर जो रोते हैं वही डुबोने वाले हैं
फ़ना निज़ामी कांपूरी
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जहां पे दफ़न है उसके बदन का ताज-महल
उधर दरीचे रखेंगी इमारतें सारी
मंज़ूर आरिफ़
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जो शख़्स भी मिला है, वो इक ज़िंदा लाश है
इंसां की दास्तान बड़ी दिल-ख़राश है
अफ़ज़ल मिन्हास
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मुस्कुरा दो किसी की मय्यत पर
मौत क्यों तीरा-ओ-मुहीब रहे
अलताफ़ मशहदी
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कर सके दफ़न ना उस कूचा में अहबाब मुझे
ख़ाक में दिल की कुदूरत ने दिया दाब मुझे
मीर तस्कीनध देहलवी

अब और कितना तमाशा बनाएगी क़िस्मत
फिरूँ में अपना जनाज़ा कहाँ कहाँ लेकर
क़ैसर सिद्दीक़ी

मौत पर शायरी


ज़िंदगी हसरतों की मय्यत है
फिर भी अरमान कर रही हो ना
कुमार विश्वास
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उठी है गर्दिश-ए-दौरां की मय्यत
घटा कांधा लगाती जा रही है
बिस्मिल देहलवी
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ए उम्मीद ए उम्मीद नौ मैदाँ
मुझसे मय्यत तिरी उठी ही नहीं
जून ईलिया
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कोई अज़ीज़ ना ठहरा हमारे दफ़न के बाद
रही जो पास तो शम्मा सर-ए-मज़ार रही
अख़तर शीरानी
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दफ़न होते ना हसीं ख़ाब अधूरे लेकिन
अपने मरने की घड़ी कोई बशर किया जाने
ज़हीब फ़ारूक़ी इफ़रंग

मौत पर शायरी


दफ़न हो कर भी जान से प्यारे
दिल के वीराँ नगर में रहते हैं
ज़फ़र मह्दी
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जनाज़ा धूम से इस आशिक़-ए-जाँ-बाज़ का निकले
तमाशे को अजब क्या वो बुत-ए-दम-बाज़ आ निकले
रंजूर अज़ीमाबादी
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हम किसी ग़ैर के शर्मिंद-ए-एहसान ना हुए
हमने ख़ुद बढ़के उठाया है जनाज़ा अपना
काज़िम जरोली
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जनाज़ा उठ चुके मेरा तो तुम भी
अदा रस्मे मुबारकबाद करना
नसीम देहलवी
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क्या इयादत को इस वक़्त आओगे तुम
जब हमारा जनाज़ा निकल जाएगा
क़मर जलालवी
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