ghazal/shairi

मसरूफ़ियत पर शायरी

मुहब्बत में कमी आने लगी है
उसे मसरूफ़ियत खाने लगी है
शाहिदा मजीद

मसरूफ़ियत उसी की है फ़ुर्सत उसी की है
इस सरज़मीन-ए-दिल पे हुकूमत उसी की है
रिहाना रूही

गाह मसरूफ़ियत सुलग उठे
गाह तन्हाई-ओ-फ़राग़ जले
अख़तर ज़ियाई

मेरे ख़ुदा यही मसरूफ़ियत बहुत है मुझे
तेरे चिराग़ जलाता बुझाता रहता हूँ
असअद बद एवनी

सारी मसरूफ़ियत की वजह वही
वही हर ख़ाब का हवाला है
ताजदार आदिल

वही शहर दर शहर मसरूफ़ियत
वही फ़िक्र कार-ए-जहाँ हर तरफ़
सुलतान अख़तर

तुम मिरा गोशवारा-ए-शब-ओ-रोज़
तुम ही मसरूफ़ियत हो फ़ुर्सत हो
वक़ार सह्र

मसरूफ़ियत पर शायरी

मुद्दत से किसी ज़ुल्फ़ की ख़ुशबू नहीं आती
मसरूफ़ियत दस्त-ए-सबा जानिए क्या हो
शाहिद अख़तर

मसरूफ़ियत ज़्यादा नहीं है मेरी यहां
मिट्टी से इक चिराग़ बनाना है और बस
सलीम कौसर

लिक्खो कभी कि मुझको तुम याद कर रहे हो
मसरूफ़ियत के लम्हे भी मुझपे वारते हो
दिया जीम

ऐ मेरी मसरूफ़ियत मुझको ज़रूरत है तेरी
इक पुराने ग़म का सर फिर से कुचलना है मुझे
स्वप्निल तेवारी

मुझको मसरूफ़ियत है दफ़्तर की
वो समझता है बेवफ़ा हूँ मैं
सग़ीर अहमद सग़ीर

उनसे तो जा के मिलना भी दुशवार हो गया
मसरूफ़ियत के नाम पे हम भी सिमट गए
ख़ुरशीद सहर

कोई मसरूफ़ियत होगी वगरना मस्लिहत होगी
ना उस पैमां फ़रामोशी से इस को बेवफ़ा कहना
सबीहा सबा

मसरूफ़ियत पर शायरी

खो गए मसरूफ़ियत की भीड़ में
ख़त्म इस में ज़िंदगानी हो गई
सलीम रज़ा रीवा

वक़्त और मसरूफ़ियत के मसले सब इक तरफ़
दूरियाँ इतनी नहीं थीं ताज अपने घर के बीच
हुसैन ताज रिज़वी

समझने सोचने से ही नहीं मिलती मुझे फ़ुर्सत
मेरी मसरूफ़ियत में शुग़्ल बेकारी भी शामिल है
राहत हुस्न

दोस्तों की भीड़ को मसरूफ़ियत में खो दिया
आज फ़ुर्सत बाम पर है रात है तन्हाई है
राज़िक़ अंसारी

मैं देर से एक दर पे ख़ाली खड़ा हुआ हूँ
किसी की मसरूफ़ियत में वक़फ़ा निकालना है
उसामा ज़ाकिर

चलो मुहब्बत की बे-ख़ुदी के हसीन ख़ल्वत-कदे में बैठें
अजीब मसरूफ़ियत रहेगी ना ग़ैर होगा ना यार होगा
अबद अलहमेद अदम

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