माफ़ी पर शायरी

माफ़ी पर शायरी

वो करेंगे मेरा क़सूर माफ़
हो चुका, कर चुके ज़रूर माफ़
नूह नारवी
۔
ख़ुदा माफ़ करे ज़िंदगी बनाते हैं
मरे गुनाह मुझे आदमी बनाते हैं
नोमान शौक़
۔
माफ़ कीजीए गुस्ताख़ियाँ हमारी हैं
लबों पे आपके ये तितलियाँ हमारी हैं
सुदेश कुमार महर
۔
वो बेगुनाही हमारी माफ़ करता है
ना फ़ैसला ही हमारे ख़िलाफ़ करता है
सईद शबाब
۔
जो दूसरों की ख़ताएँ माफ़ करते हैं
दरअसल दिल से कुदूरत वो साफ़ करते हैं
इफ़्तिख़ार राग़िब

ये रास्ते में जो शब खड़ी है हटा रहा हूँ माफ़ करना
बग़ैर इजाज़त मैं दिन को बस्ती में ला रहा हूँ माफ़ करना
ज़ुल्फ़क़ार आदिल
۔
तू ने मुझको माफ़ कर डाला
मैंने ख़ुद को नहीं माफ़ किया
शहज़ाद नय्यर

माफ़ी पर शायरी


۔
किया जो उसने मेरे साथ नामुनासिब था
माफ़ कर दिया मैंने ख़ुदा माफ़ करे
एजाज़ रहमानी
۔
इस तलख़ई हयात के लम्हों का हर कसूर
मैंने माफ़ कर दिया तो भी माफ़ कर
ताहिर अदीम
۔
दुश्मनों को माफ़ कर डाला
दोस्तों से फ़रेब खाया तो
नईम ज़रार अहमद

ख़ता उस की माफ़ी से बड़ी है
मैं क्या करता सज़ा देनी पड़ी है
सरदार
۔
अल्लाह माफ़ी दे देता है
लोग यहां पे सज़ा देते हैं
मियां वक़ार उल-इस्लाम
۔
गुम-ए-दुनिया माफ़ी चाहता हूँ
ये दिल उस को भुला पाया नहीं है
मज़हर हुसैन सय्यद
۔
ये अब जो मेरी ज़बां पर तुम्हारा नाम नहीं
उसे माफ़ी समझ लेना इंतिक़ाम नहीं
अमन शहज़ादी

माफ़ी पर शायरी


۔
माफ़ी मांगने जाएं ख़ुदा के घर लेकिन
ख़ता हरम में हुई हो तो फिर किधर जाएं
अहया भोजपोरी

की मेरे क़तल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा
हाय उस ज़ूदे-पशीमाँ का पशीमाँ होना
मिर्ज़ा ग़ालिब

फिर वही बेदिली फिर वही माज़रत
बस बहुत हो चुका ज़िंदगी माज़रत
लियाक़त अली आसिम
۔
उम्र गुज़री है माज़रत करते
ग़फ़लतें मेरी बे-हिसाब नहीं
संदीप कोल नादिम
۔
ये मुहब्बत है दोस्ती तो नहीं
माज़रत शुक्रिये तो होंगे ही
नीलम मलिक
۔
मेरे आस-पास की मुफ़लिसी मेरी माज़रत
तिरा इंतिज़ाम मैं अपने घर नहीं कर सका
अज़हर फ़राग़
۔
माज़रत घर के चराग़ों से करूँगा कैसे
मैं जो ताख़ीर पे ताख़ीर किए जाता हूँ
नईम गिलानी

Leave a Comment

Your email address will not be published.