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सुनो, बाहर ये हवा की सरसराहट सुनो।

Dinesh Shrinet
Dinesh Shrinet

इन दिनों लगातार तेज हवाएं चल रही हैं। आसमान बिल्कुल नीला रहता है या कभी-कभी पूरे आसमान में बादल छितराए हुए दिखते हैं। जैसे नीले पर किसी ने धुनी हुई सफेद रुई फैला दी हो।

धूप में अब थोड़ी तेजी है। किसी किशोर होती लड़की सी शरारत, निडरता और छेड़ने का साहस है उसमें। बाहर निकलने पर दोनों बाहें फैलाकर इस हवा को अपने शरीर में भर लेने का मन होता है। वैसे धूप के साथ-साथ हवा भी शरारती हो गई है। पीली पड़ी पत्तियों को हिला-हिलाकर गिरा रही है। दोपहर बाद सड़क पर शरारती बच्चों की तरह धूल उड़ाती चलती है। यहां तक कि आपके कपड़ों के भीतर तक उछल-कूद मचाती है।

जब नीले आसमान के नीचे आपके कपड़े हवा में फड़फड़ाते हैं तो मन में उड़ान भरने का हौसला होने लगता है। किसी कॉपी के फटे हुए पन्ने सी कोई याद उड़ती चली आती है। कदमों के बीच उछलकूद मचाती। हम उसे पहचानना चाहते हैं, तब तक उड़ती हुई दूर कहीं गुम हो जाती है।

रात-रात भर हवाएं चल रही हैं। पेड़ों की सरसराहट रात को सुनाई देती है। रात को हर पेड़ के नीचे से गुजरो तो ऊपर गुजरती हवा की आवाज अलग होती है। घने पेड़ों की सरसराहट अलग है तो महीन पत्तों से अलग ही तरीके से हवा गुजरती है। सूखे पेड़ों की शाखाएँ कुछ अलग आवाज करती हैं। जैसे हर पेड़ से हवा के गुजरने से एक अलग स्वर पैदा हो रहा हो।

सीमेंट-कंक्रीट के इस जंगल में सूखे पत्ते भी नृत्य कर रहे हैं। वे झुंड बनाकर कोनों में, दिवारों के किनारे या पेड़ों के आसपास इकट्ठा होते हैं और अचानक से फैलना शुरू हो जाते हैं। कुछ देर बात फिर सिमटने लगते हैं। मैं बालकनी से खड़ा-खड़ा सुखे पत्तों का यह नृत्य देखता रहता हूँ। जैसे कोई रशियन बैले हो, सधे हुए कदमों से नर्तक पहले गोल-गोल घूमते हैं, फिर बेतरतीब से लगते बिखर जाते हैं, अचानक फिर सिमटना शुरू कर देते हैं और किसी नन्हें बवंडर की तरह गोल-गोल घूमने लगते हैं।

कभी कोई अकेला पत्ता इस समूह नृत्य से अलग किसी और ही दिशा में भागता नज़र आता है। समझ में नहीं आता कि वो कौन सी हवा है जो उसे अलग ही ठेले जा रही है। या उस पत्ते में ही जान आ गई है जो अपने दम पर उड़ता चला जा रहा है, सबसे अलग-थलग। हवाएं मन में एक हलचल सी लेकर आती हैं, जैसे कुछ नया होने वाला है।

ये हवा आपसे फुसफुसाकर कुछ ऐसा कहना चाहती है, जिसे आप बरसों-बरस नज़रअंदाज़ करते आए हैं। क्योंकि जब-जब ऐसी हवा चलती है तो आप अपनी कार के शीशे चढ़ा लेते हैं। खिड़कियां बंद कर देते हैं ताकि आपकी टेबल पर रखी किताबों के पन्ने न फड़फड़ाने लगें।

अगर हवा की बात सुननी है तो सारी खिड़कियां खोलनी होंगी और परदों छत तक उड़ने देना होगा। बाहर निकलना होगा ताकि हवा किसी पुराने ज़िंदादिल दोस्त की तरह आपको बाहों में भर ले और वो बात कह सके, जो बरसों से कहना चाहती है। उसके पास कोई तो ऐसी कहानी है जिसका ताल्लुक आपके जीवन के सबसे खूबसूरत पलों से है।

मैंने तो फिलहाल इन हवाओं के स्वागत में अपनी खिड़कियां खोल दी हैं। अपने मोबाइल पर तेलुगु फिल्म ‘उप्पेना’ का गीत लगा दिया है, जो किसी कव्वाली की धुन जैसा है –

इश्क है पीर पयंबर
अरे इश्क-अली-दम-मस्त कलंदर

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