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लावारिस पशुओं से अपनापन ही इंसानियत

गुवाहाटी की चर्चित एनिमल एक्टिविस्ट उर्मिमाला दास
गुवाहाटी की चर्चित एनिमल एक्टिविस्ट उर्मिमाला दास

लावारिस पशुओं से अपनापन को ही इंसानियत मानती हैं उर्मिमाला दास

मानव प्रकृति में सबसे सक्षम प्राणी है। लेकिन वह अपनी सक्षमता का सबसे ज्यादा उपयोग दूसरे प्राणियों के शोषण और दोहन के लिए ही करती है। गुवाहाटी की उर्मिमाला दास लावारिस जानवरों की सुरक्षा और पोषण के लिए काम करती हैं। लेकिन यह काम किसी संघर्ष से कम नहीं है। मंदिरों-मस्जिदों में लाखों का चढ़ावा चढ़ाने वाला हमारा भारतीय समाज सड़क के लावारिस, बेसहारा जानवरों के प्रति संवेदनहीन है।

स्ट्रीट एनिमल्स के प्रति आम लोगों की संवेदनहीनता खलती है

गुवाहाटी की चर्चित एनिमल एक्टिविस्ट उर्मिमाला दास को स्ट्रीट एनिमल्स के प्रति आम लोगों की संवेदनहीनता खलती है। वो बताती है कि इंसान जानवरों के घरों पर कब्जा किए बैठा है। उनके जंगलों को उजाड़ रहा है। जंगल शहर बन रहा है। और जब शहरों में जानवर दिखते हैं तो उन्हें पत्थर से मारा जाता है। विज्ञान की हर जटिल से जटिल सिद्धांत की व्याख्या करने वाला इंसान बड़ी आसानी से भूल जाता है कि प्रकृति संरक्षण के लिए जानवर कितने आवश्यक हैं। लोगों की असंवेदनशीलता का आलम यह है कि कई लोगों ने इनसे शिकायत भी की है कि “आप जिन कुत्तों को पालती हैं उसके भौकने से हमें परेशानी होती है।” दिन रात सड़क पर गाड़ियों की शोरगुल सुनना तो लोग पसंद कर लेते हैं लेकिन वो कुत्तों की आवाज तक पसंद नहीं करते।

आज भी पशु संरक्षण से संबंधित कोई पुख्ता कानून नहीं है


उर्मिमाला दास को इस बात का बेहद अफसोस है कि देश में आज भी पशु संरक्षण से संबंधित कोई पुख्ता कानून नहीं है। आज भी कई राज्यों के कानून में जानवरों के हितों की गहरी उपेक्षा है। वो बताती है कि दरअसल, हमारा समाज इस विषय को लेकर इतना उदासीन है कि सरकार पुख्ता कानून की आवश्यक ही नहीं समझती है।

पिछले साल गर्मी के मौसम में असम से गुजरात हाथियों को भेजने के राज्य वन विभाग के निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट जाकर इस पर रोक लगवाने में उर्मिमाला दास की संस्था ‘अभिनव प्रयास’ की खास भूमिका रही


पिछले साल गर्मी के मौसम में असम वन विभाग ने चार हाथियों को असम से गुजरात ले जाने की योजना बनाई थी। इन हाथियों को असम के तिनसुकिया जिले से 3,100 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए अहमदाबाद ट्रेन के जरिए भेजा जाना था। उस समय उत्तर भारत का तापमान  तापमान 40 डिग्री से भी उपर था।  वन विभाग के इस फैसले का पशु संरक्षकों में बीच काफी विरोध हुआ। इनमें उर्मिमाला दास की अहम भूमिका रही। उस समय असम के दो पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने हाईकोर्ट में अपील की जिसमे उर्मिमाला दास की संस्था ‘अभिनव प्रयास’ की भूमिका सराहनीय रही। इस निर्णय के खिलाफ असम हाईकोर्ट में अपील की गई जहां न्यायालय ने इस निर्णय पर रोक लगा दी। 

समाज के इक्के-दुक्के लोग ही उनकी मदद को आगे आते हैं

उर्मिमाला दास अपने बल बुते बगैर किसी सरकारी सहायता के लावारिस जानवरों के संरक्षण, उनके पोषण के लिए काम करती हैं। खासकर गली के कुत्तों के लिए काम करती हैं। समाज के इक्के-दुक्के लोग ही उनकी मदद को आगे आते हैं। आज वो इन लावारिस बेजुबानों के लिए संस्थागत तरीके से प्रयास कर रही है। वो शेल्टर होम बनाने की पहल कर रही हैं। शेल्टर होम बनाते समय हुए अपने कटु अनुभवों की चर्चा करते हुए वो बताती है कि काम की शुरुआत में मुझे जिन लोगों के बारे में लगा था कि वो लोग सहयोग करेंगे उनमें से ज्यादातर लोग शेल्टर होम के नाम पर हाथ पीछे कर लिए। 


अकेला ही सही लेकिन अपने काम को लेकर उर्मिमाला दास बेहद उत्साहित रहती हैं। सरकारी-सामाजिक असहयोग से बेफ्रिक उर्मिमाला दास पूरी लगन से स्ट्रीट एनिमल के लिए काम कर रही हैं। आज ये गुवाहाटी के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं।

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