पेड़ पर शायरी

कुन्दन


बेगम और बच्चे सीज़न के लिए नथैया गली रवाना हुए, प्लान के मुताबिक़मुझे भी दो दिन के बाद उनसे जा मिलना था , मगर मिनिस्टर साहिब के दौरे की वजह से सब सरकारी नौकरीयों वालों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं तो मुझे रुकना पड़ा.
पहली बार बेगम की बेहद कमी महसूस हुई . सारा घर गंदा लगने लगा.तीन दिन बाहर होटलों के बासी तेवासी बदज़ाइक़ा खाने खाए तो मेदा और बजट दोनों चीं बोल गए….किसी नौकर की तलाश शुरू हुई जो घर की सफाई सुथराई के साथ साथ खाना भी बना सके.
किसी दोस्त की बेगम ने तरस खाकर कुन्दन की दादी को भेजा.


ये कुन्दन है? यह तो बहुत छोटी सी है….मैंने छोटी सी मासूम सी बच्ची की तरफ़ इशारा किया.
ये क्या खाने बनाएगी?… इसकी तो अभी ख़ुद गुड़ियों से खेलने की उम्र है..
ना साब जी. कुन्दन बड़ी होशयार है. क़द छोटा है इस लिए कम उम्र लगती है. मैंने ख़ुद उसे सारा कुछ सीखा दिया है. बूढी दादी का सर बेतहाशा हिलता था.


कुछ उनकी आह-ओ-ज़ारी, कुछ अपनी मजबूरी…और फिर दोनों के ग़ुर्बत के मारे सूखे बदन देख कर मैंने नीम रजामंदी से सर हिला दिया.कुन्दन बावर्ची ख़ाने की तरफ़ बढ़ गई और दादी नोट गिनती हुई अपने घर लौट गई
दफ़्तर से वापसी पर घर वाक़ई चमकता हुआ मिला…इतनी सी छांगली बराबर बच्ची और इतनी सुघड़ . खाना भी बुरा नहीं था.दाँत साफ़ करने के बाद मैंने उसे बताया कि वो अब घर वापिस जा सकती है


वो बेनयाज़ खड़ी बर्तन धोती रही. मैं एक किताब लेकर अपने कमरे में आ गया…..दरवाज़े खुलने और बंद होने की आवाज़ से मैं समझ गया कि कुन्दन जा चुकी है.मैं दिलचस्प किताब में ग़र्क़ हो कर रह गया
आहट सुन कर सर किताब से हटाया तो वह कुन्दन थी …
कुन्दन!.तुम घर नहीं गईं
वो मेरे क़दमों की तरफ़ बढ़ी..
साब जी…मैं आपके पैर दबाऊँगी …वे डरी डरी आवाज़ में बोली
“दादी ने मुझे सब कुछ समझा दिया है ….दादी कहती थी…नौकरी पक्की करवा कर ही घर लौटना
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कथाकार : नासिर खान नासिर,पाकिस्तान

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